
इंदौर के राजघराने में सभी लोग अहिल्याबाई होल्कर की तरह न्यायप्रिय ही रहे हों, ऐसा नहीं है। दूसरे राज घरानों की तरह इंदौर का राज घराने के कुछ सदस्य भी अय्याशियों, अपराधों और अनैतिक कार्यों से जुड़े रहे हैं। जब भारत के दूसरे इलाकों में आजादी की लड़ाई का बिगुल बज रहा था, तब इंदौर के शाही परिवार के कुछ लोग अपने आप में मदमस्त होकर भोग विलास में लिप्त थे। यह इंदौर के इतिहास का काला अध्याय है। इस अध्याय से पुराने ज़माने के अखबार रेंज पड़े हैं और गूंगी फिल्मों के उस दौर में भी इस पर फ़िल्में बना रहे थे। ऐसी ही एक फिल्म 1925 में बानी थी, रखा गया था --'कुलीन काँटा '.
यह वाकिया 12 जनवरी 1925 का है, जब मुंबई के पॉश मलाबार हिल इलाके में हैंगिंग गार्डन के पास खुशनुमा रोमांटिक सी शाम के करीब साढ़े सात बजे थे। एक कार में मुंबई के एक पार्षद और करोड़पति व्यापारी अब्दुल कादर बावला अपने दोस्त मैथ्यू और एक सुन्दर सी युवती के साथ जा रहे थे। तभी सामने से लाल रंग की एक मैक्सवेल कर आकर रुकी और उसमें से एक एक करके सात मुस्टंडे टाइप लोग उतरे। उनके पास पिस्तौल, चाकू, खुकरी आदि हथियार थे। उन्होंने उस कार में बैठी युवती को खींचकर बाहर निकालना चाहा, लेकिन उस कार में बैठे बावला ने उन्हें रोकना चाहा। इस पर गुंडों ने गोलियां चला दी जिसमें से एक गोली बावला को लगी. गुंडों ने चाकू से कार में बैठे अन्य लोगों को घायल कर दिया। उस युवती को चहरे पर चाकू लगा। मैथ्यू भी घायल हो गया। संयोग से उसी इलाके से अंग्रेज फौजी अफसरों की के कार जा रही थी। जैस एही उन्हें लगा कि कुछ गड़बड़ हो गई है उन्होंने तत्काल गाड़ी रोकी और अपने हथियारों से हमलावरों पर काबू पाया। फिर उन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। गोली लगने से व्यापारी बावला की मौत हो गई थी और पूरे मुंबई में सनसनी फ़ैल गई। उन दिनों अपराधियों के पास पिस्तौल जैसे हथियार कम ही होते थे।
भारत सहित पूरे यूरोप के अखबारों में इस खबर ने सनसनी फैला दी थी। कारण यह है की मौत के घाट उतरा गया व्यापारी मुंबई में अपनी खास पैठ रखता था. उसका कारोबार मुंबई से लेकर ढाका और लाहौर तक फिला था। मौत के कुछ ही समय पहले उसने कराची में रहनेवाली बीवी को तलाक़ दिया था और कार में बैठी उस युवती से शादी करनेवाला था, जिसका नाम मुमताज बेगम था और वह एक प्रोफेशनल डांसर थी. करीब दस साल से वह इंदौर के तुकोजीराव होल्कर (तृतीय) के हरम में रही, फिर किसी तरह भागकर दिल्ली और नागपुर होते हुए मुंबई पहुंची। जहाँ उसका संपर्क मालदार व्यापारी अब्दुल कादर बावला से हुआ और वह उससे शादी करने की योजना बनाने लगी।
कहते हैं कि तुकोजीराव को इसकी भनक लग गई और उन्होंने अपने गुंडे मुंबई भेजे। पुलिस ने मामला कोर्ट में पेश किया जहाँ बावल कइ परिवार की तरफ से केस जानेमाने वकील नरीमन ने लड़ा और दूसरे पक्ष ने मोहम्मद अली जिन्ना को अपना वकील बनाया। लारीब डेढ़ साल बाद कोर्ट ने इस मामले में तीन लोगों को दोषी पाया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इन तीन में से एक अपराधी पागल हो जाने से फांसी से बच गया लेकिन दो हत्यारे शफी अहमर और शामराव को फांसी पर लटका दिया गया।
तुकोजीराव तृतीय के खिलाफ कोई गवाह नहीं मिला. उनके खिलाफ ब्रिटेन के उच्च न्यायालय तक मामला गया। भारी दबाव के कारण तुकोजीराव की गद्दी जाती रही, उन्हें आदेश मिला कि अब गद्दी छोड़ दें। मजबूरी में उन्होंने अपने 17 साल के बेटे यशवंतराव को सत्ता सौंप दी।
--प्रकाश हिन्दुस्तानी