फिल्म समीक्षा : तितली

फिल्म तितली को बॉलीवुड के पेड फिल्म समीक्षक चाहे जितने स्टार दें, यह महाबकवास फिल्म है। भूलकर भी यह फिल्म देखने जाने की कोशिश न करें। यशराज बैनर की हर फिल्म अच्छी हो यह जरूरी नहीं। हां, यह फिल्म यशराज की सबसे घटिया फिल्म है। इस फिल्म को अगर स्टार देना हो, तो मैं पांच में से 'मायनस पांच' ही दे सकता हूं।

इस फिल्म में न तो मनोरंजक कहानी है, न नयनाभिराम दृश्य हैं, न दिलचस्प गाने हैं। एक्टर्स में रणवीर शौरी और नई हीरोइन शिवानी रघुवंशी का अभिनय अच्छा है। हीरो शशांक अरोरा किसी-किसी कोण से शाहरुख खान लगता है, पर है नहीं। झोपड़पट्टी में रहने वाले लूटमार का धंधा करने वाले एक परिवार की कहानी है, जिसमें किसी महिला कलाकार के लिए अभिनय की गुंजाइश लगभग नहीं ही थी। फिल्म की कहानी बताती है कि झोपड़पट्टियों में रहने वाले सब लोग गलीज किस्म के होते हैं। उनकी मानसिकता विकृत होती है। वे पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। रिश्ते, नाते उनके लिए केवल पैसे के होते हैं, जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। ऐसी घटिया फिल्म का नाम तितली के बजाय छिपकली होना था, जिससे घिन आती है। यूं भी तितली लड़कियों के लिए कहा जाता है। झोपड़पट्टी के किसी लड़के का नाम तितली हो, यह केवल निर्देशक कनु बहल ही कर सकते हैं।
इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिली है। दुनिया के लोगों को भारत की झोपड़पट्टी देखने में रूचि हो सकती है, हमें तो कोई रूचि नहीं है। शरद कटारिया और कनु बहल की लिखी इस फिल्म की कहानी में सुनहरे पर्दे के लायक कुछ नहीं। यह कोई 'चक्र' या 'दो बीघा जमीन' जैसी फिल्म नहीं है।
इस फिल्म को बॉलीवुड ड्रामा, एक्शन, मर्डर, रोमांस फिल्म कहा गया है। यशराज की फिल्म है। कुछ भी कह लो। कितने भी स्टार बांट दो और कितने भी फिल्म फेस्टिवल में डायरेक्टर की जय-जयकार करवा लो। अगर आपको किसी से दुश्मनी निकालनी हो, किसी का वक्त और मूड खराब करना हो, तो इस फिल्म के टिकिट उसे गिफ्ट कर दो, थिएटर में सजा मिल जाएगी और हां, आपको अगर कोई इस फिल्म के टिकिट के साथ 200 रुपए नकद, पॉपकार्न, कोल्ड ड्रिंक और एनासिन की गोली भी गिफ्ट में दे तो भी फिल्म देखने मत जाना।