
तमाशा एक ऐसी लव-स्टोरी है, जो शहरी पढ़े-लिखे वर्ग के एक हिस्से को बेहद पसंद आएगी। जब फिल्म खत्म हुई, तब थिएटर में युवा वर्ग की फुसफुसाहट थी कि मजा नहीं आया। ऐसा लगता है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत ज्यादा सफल नहीं होगी, लेकिन यह बात तय है कि इम्तियाज हुसैन ने एक शानदार लव-स्टोरी बनाई है। फिल्म का पहला आधा हिस्सा बेहद मनोरंजक है और बाद का बेहद संवेदनशील।

जिस तरह ‘एक-दूजे के लिए (1981)’ ने अपने जमाने में नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। वैसे नए कीर्तिमान यह फिल्म शायद ही बना पाए। इसमें एआर रहमान की धुनें, रणबीर और दीपिका का अभिनय, फ्रांस के कोर्सिका द्वीप और भारत के शिमला, गुड़गांव और कोलकाता की शानदार लोकेशन, इम्तियाज हुसैन का मंजा हुआ निर्देशन देखने को मिलता है। फिल्म के संवाद बेहद गहराई लिए हुए है और वे एक-एक लाइन में पूरा फलसफा कह जाते हैं।
इस फिल्म का एक संवाद है जिसका अर्थ है कि बचपन सांप की तरह होता है और हर कोई उस सांप को मारना चाहता है। एक और संवाद है- कम्पनीज आर लेटेस्ट कंट्री एंड कंट्रीस आर लेटेस्ट कंपनी। एक और संवाद है- जिनकी जिंदगी में प्रॉब्लम नहीं होती, वे क्रिएट कर लेते है। एक और है- किसे चाहिए मन का सोना और आंख का मोती?
इस फिल्म में रणबीर कपूर ने गजब की एक्टिंग की है और दीपिका ने भी यह साबित कर दिया है कि वही इस फिल्म में अभिनय कर सकती थी। रणबीर ने देव आनंद के अंदाज में मजेदार डायलॉग बोले हैं और असरानी की भी नकल की है। दीपिका फ्रांस में हिन्दी और अंग्रेजी नहीं जानने वाले एक फ्रांसिसी से कहती है- झंडू, फकीर, सुअर की औलाद, मर जा साले कमीने, थैंक यू। फिल्म के गाने की लाइन है- चिरकुट जिंदगी है।

फ्रांस के कोर्सिका में हीरो-हीरोइन की मुलाकात होती है और दोनों तय करते है कि वे अपना असली नाम, पता, पहचान नहीं बताएंगे और कोर्सिका के बाद भारत जाकर कभी नहीं मिलेंगे। हीरो कहता है कि मैं हूं डॉन और 12 देशों की पुलिस मुझे तलाश कर रही है। हीरोइन कहती है कि मेरा नाम है मोना डार्लिंग। हीरो पूछता है- तेजा कहां है? हीरोइन कहती है तेजा अपने दांतों का रूट केनाल करवा रहा है, क्योंकि उसके दांत में दर्द है। ऐसा ही संवाद है हीरो को हीरोइन के क्लीवेज नजर आते है, तब वह कहता है कि आपके हुस्न की वादियां यहां दिख रही है। हीरोइन हीरो से कहती है कि मैंने तुम्हें अपना दिल दिया है और तुमने अपनी जुबान।
फ्रांस में एक हफ्ते की मुलाकात के बाद हीरो-हीरोइन भारत आ जाते है और तब उन्हें लगता है कि उन्हें एक-दूसरे से इश्क हो गया था। बरसों बाद हीरोइन-हीरो से मिलती है। वह एक बहुत बड़ी औद्योगिक कंपनी की प्रमुख है। हीरो एक बड़ी कम्युनिकेशन कंपनी में बड़े पद पर है। दोनों बार-बार मिलते है और हीरो सगाई की अंगूठी बर्थ-डे पर पेश कर देता है।हीरोइन कहती है कि वह इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। क्योंकि वह जिस डॉन से मिली थी, वह डॉन तो भारत आकर वेद साहनी बन गया है और एक निहायत रूटीन लाइफ जी रहा है। हीरो का दिल टूट जाता है। फिर जैसा कि अमूमन प्यार में होता है, होने लगता है और अंत में हीरो-हीरोइन का मिलन।

इस फिल्म में रणबीर कपूर ने लार्जर देन लाइफ रोल किया है। गुरू दत्त की फिल्में देखने वाले उनमें गुरू दत्त की छवि देख सकते हैं। दीपिका पादुकोण कई जगह वहीदा रहमान को भी पीछे छोड़ती लगती है। रणबीर-दीपिका के कुछ प्रेम दृश्यों की तुलना गाइड फिल्म के देव आनंद और वहीदा रहमान के प्रेम दृश्यों को टक्कर देते लगते है। इस फिल्म में फूहड़ता और अश्लीलता नहीं है। प्रेम की गहराई को व्यक्त करने की कोशिश की गई है, लेकिन फिल्म में कुछ अटपटी बातें भी है, जैसे फ्रांस से हीरोइन का कोलकाता आना और वहां एक पंजाबी गाना- हीर तो बड़ी सेड है का दिखाना। पंजाबी गाना कोलकाता में दिखाया जाए, थोड़ा अटपटा लगता है।
बॉलीवुड की पुराने फिल्मों के यादगार दृश्यों की तरह इस फिल्म में भी कुछ दृश्य मजेदार हैं जैसे हीरो हर बार अपनी कार पोंछ कर ऑफिस जाता है और ट्रैफिक सिग्नल पर एक हिजड़ा उसे कहता है ओए हीरो कुछ देता जा, तू तो मेरा शाहरुख खान है। हीरोइन द्वारा सगाई की अंगूठी लौटाने के बाद वह हीरो निराशा में सगाई वाली हीरो की अंगूठी उस हिजड़े को दे देता है। अगले दिन हिजड़ा अंगूठी वापस कर देता है और कहता है कि इतना महंगा उपहार मुझे किसी ने नहीं दिया। वह दुआ भी देता है कि जिसके लिए तूने अंगूठी ली है, वह इसे जरूर पसंद करेगी।
इम्तियाज अली ने इसके पहले रॉकस्टार बनाई थी, जो अच्छी चली। रणबीर दीपिका की यह जवानी है दीवानी भी कामयाब रही। तारा माहेश्वरी बनी दीपिका पादुकोण ने इस फिल्म में कुछ बहुत ही भाव विभोर कर देने वाले दृश्य फिल्माए हैं। दृश्यों के एक-एक फ्रेम में वे जीवंत और ओरिजनल नजर आई। इस फिल्म में पद्मभूषण तीजन बाई की पंडवानी भी है। कहानी में रणबीर तीन रोल है, 9, 19 और 30 वर्ष के एक लड़के के, जो- स्टोरी टेलिंग का मजा लेते है और खुद भी स्टोरी टेलर होता है।
फिल्म के कुछ शुरूआती तमाशे के दृश्य बेहद लंबे है। किशोरवय के प्रेमी-प्रेमिकाओं को इस फिल्म की कहानी और संवाद पसंद आएंगे। कहानी में गंभीरता है और संवादों में एकदम नयापन। घिसी-पीटी प्रेम कहानियों से अलग तमाशा एक शानदार फिल्म है, लेकिन यह हर दर्शक को पसंद नहीं आएगी। जाते-जाते एक सवाल दर्शक के मन में रहता है कि यदि सभी लोग लीक से हटकर और अलग किस्म का काम करना चाहे तो फिर साधारण काम आखिर कौन करेगा? इस फिल्म का नाम- तमाशा थोड़ा अटपटा लगता है, लेकिन शायद यह सच भी है, क्योंकि लोग सच्चे प्रेम को तमाशा ही समझते हैं।