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इस फिल्म के सभी 13 हीरो वास्तव में मूक बधिर बच्चे है। यह फिल्म उन्हीं 13 बहादुर बच्चों को लेकर बनाई गई है, जिनका इरादा हिमालय की एक ऊंची पर्वत माला पर चढ़ने का है। माउंटेनियरिंग और राफ्टिंग पर आधारित यह फिल्म विशेष योग्यता वाले बच्चों के प्रति नजरिया बदल देती है। हम जिन्हें डिसेबल कहते हैं, वे वास्तव में अतिरिक्त योग्यता वाले बच्चे है।

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बजरंगी भाईजान की नन्हीं बच्ची शाहिदा और बर्फी का हीरो रणबीर कपूर भी मूक बधिर थे। खामोशी द म्यूजिकल और कोशिश में भी मूक बधिर जीवन को दिखाया गया था, लेकिन यह फिल्म मूक बधिर बच्चों को लेकर एडवेंचर थ्रिलर के रूप में बनाई गई है और यह बताती है कि अगर मौका मिले, तो मूक बधिर बच्चे भी वे सारे काम कर सकते है, जो दूसरे लोग करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म में गाने भी है और बच्चों पर फिल्माए गए हैं। मूक बधिर बच्चों पर गाने फिल्माने के लिए पृष्ठभूमि का गीत-संगीत लिया गया है और इशारों की भाषा में बच्चे गानों को अभिव्यक्ति देते है। यह एक अलग तरह की फिल्म है, जो एडवेंचर स्पोर्ट्स के शौकीन लोगों को जरूर देखनी चाहिए। माउंटेनियरिंग एक ऐसा खेल है, जिसमें खिलाड़ी एक दूसरे से नहीं बल्कि प्रकृति से जीतने के लिए संघर्ष करते है और अपने साथी खिलाड़ी को मुश्किल से बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने से भी नहीं हिचकते।

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यह पूरी फिल्म डिस्कवरी चैनल पर चल रहे किसी कार्यक्रम की तरह लगती है, बस इसमें कहानी और गाने जोड़ दिए गए हैं। फिल्म के सभी डायलॉग अंग्रेजी में सब टाइटल के रूप में भी चलते रहते है, जिससे यह अहसास होता है कि आप फिल्म नहीं कोई डॉक्युमेंट्री देख रहे है। सभी बच्चों ने माउंटेनियरिंग और राफ्टिंग सीख कर इस फिल्म में काम किया है और अपने-अपने किरदारों में जान डाल दी है। इनमें से एक बच्चे के पिता तो देख भी नहीं सकते, लेकिन फिल्म के स्पेशल शो में जब वे आए, तो फिल्म की ध्वनियां सुनकर ही रो पड़े।

इस फिल्म में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान की भी शूटिंग है। उत्तराखंड में फिल्माई गई यह फिल्म बताती है कि अगर हम डिजास्टर मैनेजमेंट को समझते है, तो बहुत सी जानें बचाई जा सकती हैं। 13 बच्चों के अलावा मानव भारद्वाज और प्रियंका पांचाल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महेश भट्ट फिल्म के डायरेक्टर है और मानव पांचाल फिल्म के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर। तारे जमीं पर और स्टेनली का डिब्बा जैसी फिल्मों से अलग हटकर यह फिल्म खेल पर बनी बॉलीवुड की बेहतरीन फिल्मों में मानी जा सकती है।

फिल्म के कुछ डायलॉॅग बहुत ही प्रभावशाली हैं। जैसे- देखते है अपने हिस्से की धूप हमें कहां मिलती है और तू ही सिपाही है और तू ही खिलाड़ी। फिल्म में मूक बधिर बच्चे अपनी घायल शिक्षिका को सीपीआर देते हैं, क्योंकि उन्हें ट्रेनिंग में बताया जाता है कि जब भी संकट में पड़ो, तब फस्र्ट एड, कम्युनिकेशन और घायल को सुरक्षित स्थान पर भेजना सबसे सुरक्षित काम होते है। तकनीक, हिम्मत और लगन से किसी भी परेशानी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। फिल्म के गाने की लाइन है आगे ही बढ़ना तेरा धर्म है, पर्वत है ऊंचा, तो तू भी क्या कम है।


बॉलीवुड में खेलों पर बनने वाली लगान और चक दे इंडिया जैसा मनोरंजन तो यह फिल्म नहीं करती पर इकबाल, से सलाम इंडिया, हैट्रिक, भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों को टक्कर जरूर देती है। फिल्म में कोई बड़े सितारे नहीं है और फिल्म का प्रचार भी अच्छा नहीं किया गया है, लेकिन फिल्म अच्छी है आप अपने परिवार के बच्चों को यह फिल्म दिखाने ले जा सकते है। फिल्म देखने के बाद बच्चे खेलो और मूक बधिरों के प्रति अपनी धारणा बदल देंगे।

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