
‘‘यार ये साला विधु विनोद चोपड़ा पिक्चर तो अच्छी बनाता है रे’’ सिनेमाघर से बाहर निकलते समय दर्शक बात कर रहे थे।
"और वो लम्बू, साले की दोनों टांगे नहीं रहती फिर भी अच्छी एक्टिंग कर गया यार।"
"अपने सवानंद करकरे का भी गाना था इसमें। कौन सा था ?"

वजीर फिल्म देखकर बाहर निकलते समय ऐसे कई डायलॉग दर्शकों के मुंह से निकल रहे थे। ऐसा लगा कि लोगों को फिल्म पसंद आई। मुझे भी फिल्म अच्छी लगी। पर इस फिल्म का सैय्यद मोदी हत्याकांड से कोई लेना-देना है ही नहीं। जबरदस्ती सैय्यद मोदी के बहाने प्रचार पा लिया।
थ्रिलर और एक्शन से भरपूर वजीर शतरंज के खेल पर आधारित है। फिल्म में दो दोस्तों की कहानी है, जिनका दुश्मन एक होता है और दुश्मन से निपटते-निपटते वे आपस में शतरंज की बाजी खेलने लगते हैं। उनकी जिंदगी का मकसद एक ही दुश्मन को खत्म करना रहता है। एक अपाहिज बूढ़ा और एक एटीएस का निलंबित अधिकारी। शतरंज खेलते-खेलते दर्शक को भी इस फिल्म के अंत का एहसास होने लगता है और यहीं फिल्म की पकड़ थोड़ी कमजोर हो जाती है। पौने दो घंटे की फिल्म में करीब २७ मिनिट के गाने भरे गए है, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। फिर फिल्म दिलचस्प बनी है।

विधु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म का डायरेक्शन बिजॉय नाम्बिआर ने किया। पर पूरी फिल्म में विधु विनोद चोपड़ा ही छाये रहे। इस फिल्म की कहानी और पटकथा उन्हीं की है। कहानी ही इस फिल्म की जान है। ऊपर से अमिताभ बच्चन का शानदार अभिनय। अमिताभ ने इस फिल्म में दोनों पैरों से अपाहिज शतरंज खिलाड़ी की भूमिका की है। अपनी आंखों और हाव-भाव से उन्होंने फिल्म में जान डाल दी।
पर्दे पर अमिताभ की एंट्री के पहले लगता था कि फरहान अख्तर बहुत अच्छा अभिनय कर रहे है, लेकिन पर्दे पर अमिताभ के आते ही वे फीके पड़ गए। अदिति राव हैदरी के लिए कोई बड़ा रोल था ही नहीं और नील नितिन मुकेश वजीर तो क्या, प्यादे से भी कमतर रह गए। पता नहीं इस फिल्म में उन्होंने काम क्यों किया। मानव कौल फिल्म के खलनायक है और जॉन अब्राहम भी एक छोटी भूमिका में है।
आप शतरंज के खिलाड़ी हो या ना हो, फिल्म में कहानी आपको अच्छी तरह समझ में आ जाएगी। फिल्म के डायलॉग एक से बढ़कर एक है। अनेक डायलॉग ऐसे है, जो शतरंज को लेकर लिखे गए है। जैसे-
- जिंदगी में किसी को दूसरा मौका नहीं मिलता, लेकिन शतरंज में हरेक को दूसरा मौका मिलता है।
- इस खेल में हारने वाले की भी जीत होती है।
- शतरंज वक्त का खेल है, लेकिन ऐसे खेलने का कोई वक्त नहीं।
- शतरंज और जिंदगी में बड़ा फर्क है। शतरंज में हाथी और घोड़े आगे दौड़ते है और असल जिंदगी में कुत्ते।
- अगर प्यादा बादशाह के साथ खेलेगा, तो बुरी मौत मरेगा।
- जो आदमी आधी रात को बिना फोन किए शतरंज खेलने आ जाए वह आपका दोस्त ही हो सकता है।
- प्यादा होकर बादशाह पर जूता फेंकने वाले का बुरा हाल होता है।
इस फिल्म के कुछ दृश्य बहुत ही भावपूर्ण हो गए है। जैसे अदिति राव हैदरी का आंसू पोंछते हुए फरहान अख्तर का थरथराता हाथ। इसी फिल्म में अमिताभ का वन लाइनर है- आज के जमाने में लोग मोहब्बत भी किफायत से करते है। लव की स्पेलिंग अब LUV हो गई है। आप खुशकिस्मत है कि एक-दूसरे के कंधे पर सिर रखकर रो तो सकते हो।
कोई ढाई दशक से विधु विनोद चोपड़ा इस फिल्म की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने तय किया था कि यह फिल्म हॉलीवुड के लिए बनाएंगे। सब तैयारियां भी हो गई थी, लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। इस फिल्म की कहानी उन्होंने अंग्रेजी में लिखी थी। डस्टिन हॉफमैन इसकी प्रमुख भूमिका में थे, लेकिन 2005 में ही इस बॉलीवुड फिल्म के निर्माता रॉबर्ट न्यूमेयर की मौत हो गई। इस तरह यह फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई। बिजॉय नाम्बिआर की फिल्म डेविड देखने के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने यह प्रोजेक्ट उन्हें दे दिया। विधु विनोद चोपड़ा खुुद इस फिल्म के एडिटर भी है, जिसकी छाप इस फिल्म में देखने को मिलती है।
इस फिल्म में प्रतिशोध की भावना में जल रहे एक अपाजित बूढ़े का रोल अमिताभ ने बहुत ही बढ़िया तरीके से निभाया है। अदिति राव हैदरी से भी थोड़ी बहत एक्टिंग करवाने में निर्देशक सफल रहे। फिल्म के डायलॉग और एडिटिंग गजब की है। यह फिल्म छोटी है, इसलिए इसे देखना सुविधाजनक लगता है।
8 January 2016
2.23 PM