
चॉक एन डस्टर फिल्म तो अच्छी है, पर चलेगी नहीं। क्योंकि अच्छी फिल्में आजकल कहां चलती है। वैसे भी सिनेमा घर में शिक्षा व्यवस्था, स्कूल मैनेजमेंट और शिक्षकों के रिश्ते तथा विद्यार्थियों और शिक्षकों के नाजुक रिश्ते पर फिल्म देखना ही कौन चाहता है। इसे बिहार में टैक्स फ्री कर दिया गया है और कुछ दूसरे राज्यों में भी टैक्स फ्री होने की संभावना है। टैक्स फ्री होने के बाद भी यह फिल्म चल पाएगी, इसमें शक है।
इस फिल्म में शबाना आजमी, जूही चावला, गिरीश कर्नाड, जरीना वहाब, दिव्या दत्ता, समीर सोनी, उपासना सिंह आदि तो है ही, अतिथि कलाकार के रूप में ऋषि कपूर, जैकी श्राफ और रिचा चड्ढा भी है। इतने कलाकारों की भीड़ होते हुए भी फिल्म ने कोई खास तेजी नहीं है। शिक्षक और विद्यार्थी के नाजुक रिश्ते से शुरू होती यह फिल्म अंत में जाकर कौन बनेगा करोड़पति की पेरोडी बन जाती है।
प्रायवेट सेक्टर में शिक्षा का कारोबार कैसे हो रहा है, इसकी झलक इस फिल्म में दिखाई जाती है। स्कूलों में शिक्षा गौण हो गई है और मार्केटिंग प्रमुख। हर प्रायवेट स्कूल अपने यहां मालदार और मशहूर लोगों के बच्चों को भर्ती करना चाहता है, जो मोटी फीस भर सके। उनके लिए विद्यार्थी एक तरह का कच्चा माल है और उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके शिक्षकों की स्थिति क्या है। दुर्भाग्य से सरकार भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है। इस फिल्म में डायलॉग भी है कि हमारे देश में सारा का सारा रेसपेक्ट केवल पॉवरफुल और पैसेवाले लोगों के लिए है। शिक्षकों के लिए इस देश में कोई संभावना नहीं है। हम नेताओं, अभिनेताओं और क्रिकेट सितारों को आदर्श मानते है, शिक्षकों को नहीं।

जयंत गिलटकर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में शबाना आजमी, जूही चावला और गिरीश कर्नाड ने शानदार अभिनय किया है। यह फिल्म इनके अभिनय के कारण ही देखी जा सकती है, लेकिन नैतिकता का पाठ पढ़ाने की कोशिश में फिल्म कमजोर होती गई। कांता बेन स्कूल के शिक्षक पूरी ईमानदारी से अपना कार्य करते हैं, लेकिन प्रबंधन के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है। प्रबंधन एक ऐसी शिक्षिका को प्राचार्य बना देता है, जो उन्हें सिखाती है कि इस स्कूल में केवल बड़े लोगों के बच्चे ही पढ़ने के लिए आने चाहिए, तभी यह स्कूल अच्छा मुनाफा कमा सकता है। स्कूल के पुराने शिक्षकों को एक-एक करके निकालने की साजिश होती है। किसी कमर्शियल कॉम्पलेक्स की तरह स्कूल में टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पुल, एसी ऑडिटोरियम और ऐसी ही सुविधाएं मुहैया कराई जाती है और पैसे बचाने के लिए पुराने शिक्षकों को हटाकर उनसे कम वेतन वाले नए शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है। शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने के भी पैसे लिए जाने लगते है, यहां तक कि शिक्षकों को मिलने वाले कम्पलिमेंटरी चाय बंद कर दी जाती है। कक्षाओं में से शिक्षकों की कुर्सी हटा दी जाती है और निर्देश दिया जाता है कि वे खड़े होकरे ही पढ़ाए। यहां तक की हाजरी भरने जैसे काम भी उन्हें खड़े-खड़े ही करने पड़ते है। शबाना आजमी और जूही चावला जैसी शिक्षिकाएं बर्खास्त कर दी जाती है और वे स्कूल प्रबंधन से इंडिया न्यूज चैनल की मदद से संघर्ष करती है।
दिव्या दत्ता ने इस फिल्म में स्कूल की नई प्राचार्य कामिनी गुप्ता का एकतरफा रोल किया है। जिसमें केवल नेगेटिव शेड्स है। दिव्या दत्ता के खिलाफ कोई भी नहीं बोल पाता, लेकिन जैसा की आदर्शवादी फिल्म में होता है, अंंत में शिक्षकों की जीत होती है।
नैतिकता के बघार वाली यह फिल्म आज के दर्शकों को शायद ही पसंद आए। क्योंकि इसकी प्रस्तुति पुराने ढंग की है। मानो बासु चटर्जी या ऋषिकेश मुखर्जी की कोई फिल्म देख रहे हो। इस फिल्म में शिक्षिकाओं के परिवार को सपोर्टिव दिखाया गया है। कुल मिलाकर शिक्षा तंत्र के बाजारूकरण पर यह एक अच्छी फिल्म है, जो भावुकता और संवेदनाओं से भरी हुई है, लेकिन सवाल यहीं है कि ऐसी फिल्में दर्शक देखना ही कहां चाहते है? मैंने यह फिल्म इंदौर के आईनॉक्स में देखी और फिल्म शुरू होने के 15 मिनिट तक मैं एक मात्र दर्शक मौजूद था। कुछ देर बाद दो और दर्शक आए। आईनाक्स ने इस तरह शाही तरीके से हमें फिल्म देखने का मौका दिया।
15 January 2016
2.30 PM