
नीरजा भनोट के जीवन पर फिल्म बनाने की घोषणा 2010 में हुई थी, लेकिन फिल्म अब रिलीज हुई है। कुछ छोटी-मोटी बातों को छोड़ दें, तो नीरजा देखने लायक फिल्म है। शांतिकाल के सबसे बड़े वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित होने वाली सबसे कम उम्र की नीरजा भनोट की कहानी नाटकीयता के साथ पेश की गई है। कुछ तथ्य छुपा लिए गए है और कुछ जोड़ दिए गए है। फिल्म के पहले ही निर्देशक ने जता दिया था कि यह फिल्म नीरजा भनोट के जीवन से प्रेरणा लेकर बनाई गई है। यह न तो नीरजा भनोट की जीवनी है और न ही डाक्युमेंट्री।

नीरजा भनोट वास्तव में सोनम कपूर से ज्यादा सुंदर थीं। सोनम कपूर की सुंदरता को छोड़ दे, तो भी वे नीरजा कम ही लगी हैं। पेन एम के जम्बो जेट लाइनर की सीनियर फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट को इस फिल्म में चीफ फ्लाइट पर्सर बताया गया है। पेन एम जेट लाइनर में छह इमरजेंसी गेट थे, फिल्म में चार ही बताए गए है। नीरजा के पिता हरीश भनोट मुंबई में हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो चीफ थे। उनका दफ्तर इस फिल्म में ऐसा दिखाया गया है, मानो पूरा एडिशन ही वहां से निकलता हो। सबसे अखरने वाली बात यह लगी कि इस फिल्म में तनाव के दृश्यों में सोनम कपूर ने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन्हें बदहजमी की समस्या है। नीरजा की मां के रूप में शबाना आजमी ने बहुत ही अच्छी एक्टिंग की हैं। नीरजा के पिता बने योगेन्द्र टीकू ठीक ही लगे।

इस फिल्म की कहानी अमेरिकी विमान के कराची में अपहरण होने की है। मुंबई से उड़ान भरने वाला यह विमान कराची के रास्ते फ्रेंकफर्त जा रहा था कि अबु निदाल के चार आतंकियों ने उसे कराची एयरपोर्ट पर अपह्रत कर लिया। विमान में 379 यात्री थे, जिनमें से 20 को आतंकियों ने मार डाला। नीरजा ने अपनी चतुराई से सबसे पहले पायलेट को विमान के हाइजैक होने की सूचना दी, जिसे पाते ही विमान के तीनों पायलेट इमरजेंसी विंडो से निकलकर भाग गए। नीरजा की सूझ-बूझ से अपहरणकर्ता विमान को उड़ाकर नहीं ले जा सके। 17 घंटे की मेहनत के बाद नीरजा ने किसी तरह विमान के इमरजेंसी गेट खोले और 359 यात्री बचा लिए गए। आतंकवादियों को फुसलाते हुए नीरजा ने यह 17 घंटे बेहद बहादुरी और चतुराई से गुजारे और अंत में आतंकी की गोली का शिकार बनी। (नीरजा को फ्लाइट पर्सर/एयर होस्टेस की ट्रेनिंग के दौरान मियामी में इस तरह का प्रशिक्षण भी दिया गया था कि अगर विमान का अपहरण हो जाए, तो उस दशा में क्या करें? फिल्म में ट्रेनिंग का जिक्र नहीं है।)
नीरजा की बहादुरी पर बनी इस फिल्म में भी निर्देशक ने वे सीन ठूंस दिए हैं, जिनकी जरूरत नहीं थी। कहानी को इमोशनल बनाने के चक्कर में नीरजा की मां द्वारा पंडित से लाई गई जीवन रक्षक अंगूठी का जिक्र फिजूल लगा, क्योंकि फिल्म के अनुसार वह अंगूठी नीरजा के हाथ में नहीं थी और वह आतंकी की गोली का शिकार हुई, जबकि वास्तविकता यह थी कि नीरजा ने विमान के यात्रियों को बचाते हुए अपनी जान दी थी। नीरजा पर ड्यूटी पर जाते समय रात को दो बजे उसकी मां द्वारा दही खिलाने का शगुन भी अटपटा लगा। नीरजा के जन्म पर जन्म कुंडली दिखलाने का जिक्र और पंडित का यह कहना कि यह आपका कुल दीपक बनेगी भी अटपटा ही लगा।

निर्देशक ने कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए नीरजा भनोट को राजेश खन्ना का फैन दिखाया है। जो बात-बात पर राजेश खन्ना की फिल्मों के डायलॉग दोहराती है। जैसे- बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं। राजेश खन्ना की ही फिल्म के एक डायलॉग का उपयोग नीरजा अपनी मां को संदेश के रूप में देती है- पुष्पा, तेरी आंखों में आंंसू अच्छे नहीं लगते रे।
नीरजा की कहानी उस दौर की है, जब इंटरनेट, मोबाइल और अनेक टीवी चैनल नहीं थे। समाचारों के लिए आकाशवाणी, दूरदर्शन और समाचार पत्र ही माध्यम हुआ करते थे। नीरजा के पिता को देर रात खबर मिलती है कि नीरजा के विमान का अपहरण हो गया है। सुबह चार बजे की फ्लाइट थी, जो 5.20 बजे सुबह कराची पहुंची थी। ऐसे में नीरजा के पिता को अखबार के दफ्तर में दिखाया गया है। कौन-सा ब्यूरो चीफ सुबह पांच बजे अखबार के दफ्तर में होता है? लेकिन यहां का एक दृश्य है, जब नीरजा के पिता नीरजा की मां को फोन पर विमान के अपहरण की सूचना देते है, तो उधर से बेहद लड़खड़ाती और घबराई हुई सी आवाज मे उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहती है कि सब ठीक हो जाएगा, आप फिक्र मत करो। एक छोटे से डायलॉग में शबाना आजमी ने साबित कर दिया कि वे शबाना आजमी है।
23 साल की नीरजा की शादी हो चुकी थी और केवल ढाई महीने ही चली। उन्होंने अनेक उत्पादों के लिए मॉडलिंग भी की थी। फिल्म मेंं इस बात को बार-बार दिखाया गया है और इसमें दहेज और नारी उत्पीड़न की घटना भी जोड़ी गई है, लेकिन फिल्म में नीरजा की वह इच्छा नहीं बताई गई, जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरे शरीर पर पति की छाया भी मत पड़ने देना।

फिल्मकार को आजादी होती है कि वह कहानी के हिसाब से कुछ दृश्य जोड़ ले या घटा ले। यह अच्छी बात है कि पिछले कुछ दिनों से हिन्दी में ऐसी फिल्में बनने लगी हैं, जिनसे पता चलता है कि हम भारतीय भी किसी से कम नहीं हैं। हाल ही में हवाईजादे फिल्म आई थी, जो शिवकर बापूजी तलपड़े के जीवन पर आधारित थी और उन्हीं का हवाई जहाज कबाड़ में खरीदकर राइटबंधु अपने साथ ले गए थे और उसे उड़ाकर उन्होंने इतिहास में नाम दर्ज करा लिया था। एयरलिफ्ट भी भारतीयों की विलक्षण प्रतिभा और हौसले की कहानी है और अब नीरजा भी यह बताती है कि हम भारतीय किसी से कम नहीं। यह बात सुकून देने वाली है कि झंडा फहराने, राष्ट्रगान गाने और सूर्य नमस्कार से मना ही करने पर बहस करने वाले देश में ऐसी फिल्में बन रही है।
19 Feb 2016
2.40 PM