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गांवों के गरीब किसानों की जमीन पर बनने वाले विकास के मंदिरों की सच्चाई जय गंगाजल में है। फिल्म को देखते समय कई बार मुट्ठियां भिंच जाती हैं। नेता, पुलिस अफसर, उद्योगपति और मीडिया का गठजोड़। आम आदमी की लाचारी। सर्वशक्तिमान चौकड़ी और अत्याचारों से पीड़ित जनता। नेताओं के सामने घूंटे पर बंधे रहने वाले पुलिस अफसर, जो मौका पड़ने पर बाहुबली बन जाते हैं और लालच में दलाल। ये पुलिस वाले थानों को रंडीखाना बना देते है, जहां वह बिक कर बैठ जाते हैं।

आरटीआई के उपयोग को लेकर भी फिल्म में कमेंट्स है, जो बताता है कि किस तरह आरटीआई शक्तिशाली लोगों के लिए ही हित साधन बना हुआ हैं, लेकिन जब एसपी बनी प्रियंका चोपड़ा विधायक के प्रस्ताव पर कहती है कि मैं अपराधियों के साथ डील नहीं करती, तब अच्छा लगता हैं। गरीबों के लिए ये पुलिस वाले खुद कानून बनाते हैं और फैसला भी खुद ही लेते हैं, लेकिन जब कोई पॉवरफुल आदमी आता है, तब कहते हैं कि कानून और कोर्ट इस मामले में डील करेगा। पॉवरफुल लोगों के लिए वकीलों की फौज होती है, जो कोर्ट में सही सबूत पेश होने ही नहीं देती।

भ्रष्ट नेताओं के संरक्षण में पैसे वालों के लिए काम करते हुए डीएसपी स्तर के अधिकारी जिस तरह होटलों, कारखानों और बड़ी-बड़ी संपत्तियों के मालिक हो जाते हैं, यह सब इस फिल्म में दिखाया गया है। फिल्म की शूटिंग भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में की गई है। इससे भी इसकी विश्वसनीयता बढ़ गई, क्योंकि यहां चपरासी और पटवारी स्तर के कर्मचारियों के पास भी करोड़ों का काला धन मिला हैं। फिल्म में एबीपी न्यूज, पीपुल्स समाचार, प्रदेश टुडे, बंसल हॉस्पिटल और फैक्ट्री जैसे इलाकों को देखकर लगता है कि शायद सबकुछ वास्तव में घटित हो रहा है।

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इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा को लेडी सिंघम जैसा दिखाया गया हैं। प्रकाश झा ने भी इस फिल्म में उनके बाद दूसरी बड़ी भूमिका निभाई हैं। मानव कौल और अन्य कलाकार उसके बाद आते हैं। बांकेपुर में पहली बार एसपी की पोस्टिंग पाने वाली प्रियंका चोपड़ा राजनीतिज्ञ के सहयोग से ही पद पर पहुंचती है, लेकिन जब वह अपना काम ईमानदारी से करना शुरू करती है कि पता चलता है कि उसके गॉडफादरनुमा नेता भी भ्रष्ट लोगों से मिले हुए हैं।

विकास के नाम पर स्थापित किए जाने वाले 1600 मेगावॉट के सामंता पॉवर के बिजली घर की जमीन के लिए जमीनों का खेल जिस तरह होता है, यह इस फिल्म में दिखाया गया हैं। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, नेता, मीडिया, जाने-माने वकील और पुलिस के कुछ अधिकारी इस तरह कार्य करते हैं, मानो उन्हें नियुक्त ही इस काम के लिए किया गया हो। इस बीच कहानी में मंत्री और विधायक की गुंडागर्दी के तमाम पुराने फार्मूले डाल दिए गए हैं कि किस तरह गुंडों के सहारे छुटभैया नेता विधायक और मंत्री तक बन जाते हैं और उनका काम केवल पैसा बनाना रहता हैं। इसके लिए वे बलात्कार, मारपीट, अपहरण जैसे अपराधों से भी बाज नहीं आते। भारत के लगभग सभी राज्यों में इस तरह के नेता नजर आ जाते हैं।

प्रकाश झा ने ऐसे ही एक दलालनुमा डीएसपी की भूमिका निभाई हैं। इंटरवल के बाद इस डीएसपी का जमीर जाग जाता हैं, वह भी अमिताभ बच्चन की फार्मूला फिल्मों की तरह अपने बूते पर इंसाफ की लड़ाई करने और भ्रष्ट विधायक और उसके रिश्तेदारों को सबक सिखाने में जुट जाता हैं। अंत में कानून की जीत होती है। गंगाजल जैसी पवित्र भावना से भ्रष्ट पुलिस वालों की खाकी वर्दी साफ हो जाती हैं। यह फिल्म 2003 में बनने वाली गंगाजल का सीक्वल नहीं है। एक नई कहानी इस फिल्म में है, जो 1990 में आई तेलुगु फिल्म कत्र्तव्यं से प्रेरित बताई जाती है।

प्रियंका चोपड़ा की एक्टिंग जबरदस्त हैं। उसके बाद प्रकाश झा एक्टिंग के मैदान में उतरे हैं। वे पहली बार एक्टिंग कर रहे हैं और कई मौकों पर बिना डायलॉग बोले उन्होंने अपने चेहरे के भावों से बात कह दी। मुरली शर्मा विधायक के छर्रे के रूप में मुन्नी मर्दानी बने हैं। फिल्म के गानों की कोई जरूरत थी नहीं, फिर भी बैक ग्राउंड में गाने हैं। चुनाव की घोषणा होते ही नेताओं के तलवे चाटने वाले पुलिस वाले कैसे मर्द बन जाते हैं, इसके कई नमूना इस फिल्म में दिखाए गए हैं। फिल्म में प्रकाश झा एसपी प्रियंका चोपड़ा को बार-बार कहते हैं- ‘‘आपको गलत मिस गाइड किया गया है मैडम सर।’’

पुनश्च : जय गंगाजल देखते वक्त अपने शहर के कई विधायकों के चेहरे सामने आ जाते हैं और मंत्रियों के भी। अरे! यह तो अपने फलाने विधायक जैसा हैं। जब वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दिखाया जाता हैं, तब लगता है कि यह तो अपनी खाल में मस्त हमारे शहर का ही वरिष्ठ आईपीएस हैं। जब भ्रष्ट डीएसपी दिखाए जाते हैं, तब एक-एक करके अपने शहर के वे पुलिस वाले याद आ जाते हैं, जो किसी बिल्डर के यहां काम करता हैं, जो निजी मेडिकल कॉलेज में भर्तियों की दलाली करता हैं, जो शहर के बड़े होटल में ‘सप्लाय’ के लिए जाना जाता हैं, जो विधायक का फंड मैनेजर हैं, जो दारू के बड़े ठेके में पार्टनर हैं...

इस नजरिये से भी फिल्म देखेंगे तो मजा आएगा। आप पहचानिये उन लोगों को।

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