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‘की एंड का’ मनोरंजक फिल्म है। शहरी मध्यवर्ग को यह फिल्म खास पसंद आएगी। मल्टीप्लेक्स और गोल्ड क्लास वालों के लिए आर. बाल्की की यह पेशकश दिलचस्प है, लेकिन विचार के स्तर पर अंत तक जाते-जाते फिल्म फुस्स हो जाती है। शुरू में जो भ्रम होता है कि यह कोई क्रांतिकारी कहानी पर बनी फिल्म है, वह टूटने लगता है। कहानी के अनुसार लगता है कि औरतें कितनी भी पढ़-लिख जाएं, कितनी भी बड़ी हैसियत पा लें, लेकिन उनके भीतर पुरुषों के प्रति ईष्र्या बनी ही रहती है। ‘की’ की ही रहती है, ‘का’ बनने की कोशिश भी करें, तब भी की ही रहती हैं।

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कहानी में मल्टीनेशनल कंपनी में रोबोट की तरह काम करने वाली मार्केटिंग मैनेजर करीना कपूर खान हैं, एक बहुत बड़े बिल्डर की एकलौती संतान अर्जुन कपूर हैं। अर्जुन कपूर की मां नहीं है, करीना का कपूर का बाप। अर्जुन कपूर आईआईएम का टॉपर है, पर अपने पिता रजत कपूर की कंपनी संभालना नहीं चाहता और अपनी मां से प्रेरित होकर मां जैसा बनना चाहता है। करीना कपूर की मां स्वरूप संपत हैं, जो एनजीओ टाइप सोशल वर्क करती है। करीना कपूर को स्वरूप संपत ने ग्रेनाइट खाकर पैदा किया था, इसलिए वह एकदम कड़क स्वभाव की हैं। इसके विपरीत अर्जुन कपूर की अगर दाढ़ी न हो, तो वह बच्चा ही रहता है।

एक फ्लाइट में दोनों मिलते है और अर्जुन कपूर करीना कपूर पर लाइन नहीं, पूरा फुल सर्कल मारता है। दोनों में दोस्ती होती है, करीना कपूर 31 साल की है और अर्जुन 28 का। दोनों का जन्मदिन एक ही दिन आता है। दोनों शादी करने के लिए अपने-अपने मां-बाप से मिलते हैं। अर्जुन कपूर का बाप उससे कहता है कि मैं तुझसे शर्मिंदा हूं। इसके विपरीत करीना कपूर की मां अर्जुन कपूर को पसंद कर लेती हैं और दोनों के जन्मदिन वाले दिन ही कोर्ट में शादी हो जाती हैं।

फिर शुरू होती है घर-घर की कहानी नहीं, बाल्की के घर की कहानी। मंगलसूत्र पहनने वाला हीरो घर का सारा कामकाज करता हैं। बीवी की सेवा, सांस की सेवा और वह सारी जिम्मेदारी, जो कोई भी ‘हाउस हसबैंड’ को करनी होती हैं। फॉर्मूला यही है कि ‘का’ घर में लेकर काम करें और ‘की’ बाहर जाकर। हि़ज एंड हर्स का अनुवाद बाल्की चाहते तो ‘उसका और उसकी’ कर सकते थे, पर पा फिल्म की तर्ज पर ही उन्होंने इसका नाम भी की एंड का रखा है। यह नाम ही इतना दिलचस्प है कि पूरी कहानी कह जाता है।

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दिलचस्प कहानी होने के कारण फिल्म में मनोरंजन के अनेक मौके अपने आप ही आ जाते है। मंगलसूत्र पहनने वाला पति अपने हाथ में ब्रेसलेट की तरह मंगलसूत्र पहनता है। वह एक जालिम पति नहीं है, लेकिन फिर भी अपनी इकलौती बीवी को काम पर भेजता है। शादी के पहले दोनों के अनेक लफड़े चलते रहते हैं, जिनका जिक्रभर कहानी में है। बिल्डर बाप का बेटा हाउस हसबैंड होकर ‘घर’ बनाता हैं। मौका पड़ने पर वह धर्मेंद्र बन जाता है और वक्त मिले तो ऋतिक रोशन। (इमरान हाशमी की भूमिका भी फिल्म में बार-बार करता है।) आईआईएम का टॉपर हीरो अपनी बीवी की सहेलियों को सलाह देता है कि वर्कोहलिक से शादी कभी नहीं करनी चाहिए, अल्कोहलिक से भले ही कर लो। फिल्म का ही एक डायलॉग है कि औरतें पैकेज डील करती है, वे अपने पति से प्यार नहीं करती, वे अपने पति के औहदे, संपत्ति और प्रतिष्ठा से प्यार करती है। महत्वाकांक्षी पत्नी अपनी नौकरी में प्रमोशन के खातिर बच्चे पैदा नहीं करना चाहती, क्योंकि उसे बच्चे पसंद तो है, लेकिन पड़ोसन के।

एक तरह से फेमिनिस्ट का रोल करने वाले अर्जुन कपूर के लिए गृहिणी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। वह कहता है कि गृहिणियां सबसे बड़ी आर्टिस्ट होती है। जब वह यह कहता है कि मैं अपनी मां जैसा बनना चाहता हूं, तब हीरोइन उससे कहती है कि कौन सा मर्द अपनी मां जैसा बनना चाहता है? हीरो जवाब देता है कि बहुत सारे मर्द है, जो अपनी मां जैसा होना चाहते हैं। राजीव गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी जैसा होना चाहते थे और राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी जैसा होना चाहते है। मां जैसा होने में क्या बुराई है? हीरोइन कहती है कि तू क्या प्रधानमंत्री के खानदान का है? फिल्म में एक और दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब हाउस हसबैंड के रूप में ख्यात हो चुके अर्जुन कपूर को टीवी पर देखकर जया बच्चन प्रभावित हो जाती है और अमिताभ बच्चन से कहती है कि मुझे इस लड़के से मिलना है। अमिताभ के बुलावे पर अर्जुन कपूर अमिताभ के घर डिनर के लिए जाता है और बच्चन दंपत्ति के साथ डिनर करता है। तीन मिनिट के दृश्य में आर. बाल्की ने साबित कर दिया कि वे बेहतरीन डायरेक्टर हैं और अमिताभ ने भी गिनती के संवादों और अपने हाव-भाव से बता दिया कि वे अमिताभ बच्चन ही है। फिल्म की यह शूटिंग अमिताभ के जुहू वाले असली घर में हुई है।

फिल्म में होममेकर के रूप में महिलाओं की स्थिति की चर्चा प्रमुखता से है। जो घर संभालता है, वह किसी को भी नहीं दिखता। घर वालों को भी नहीं। जो कमाने के लिए बाहर जाता है, वहीं सबको नजर आता है और उसी को महत्व दिया जाता है। बिना विजिटिंग कार्ड या पोजिशन के काम करने वालों का महत्व कोई नहीं समझता। फिल्म में अर्जुन कपूर हाउस हसबैंड के रूप में मोस्ट वांटेड मुंडा के रूप में चर्चित हो जाते हैं। ऐसे हसबैंड के रूप में, जिन्हें दूसरों की बीवियां भगाने की इच्छुक रहती है।

की एंड का की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए लेखक ने ईष्र्या का भाव भी डाल दिया हैं। हसबैंड के वंâधे पर सवार ‘की’ को कामयाबी मिलने लगती है और उसे इस बात का भ्रम होने लगता है कि उसका हाउस हसबैंड उसके पैसों पर पल रहा है। की के इस भ्रम से का दुखी हो जाता है और घर छोड़कर चला जाता है। अंत में दिलचस्प तरीके से दोनों की मुलाकात दिखाई गई है।

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फिल्म में अखरने वाली बातें बहुत सारी हैं। जब कहानी की शुरूआत नएपन और दिलचस्प तरीके से हुई थी, तो उसे जलन जैसे मसले पर लाना क्यों जरूरी था? क्या यह दिखाने के लिए कि महिलाओं में जलन होना उनका स्वभाविक गुण है? या यह दिखाने के लिए कि महिलाएं किसी को भी श्रेय देना नहीं चाहती? हाउस हसबैंड बने अर्जुन कपूर को आईआईएम टॉपर दिखाया गया है, जो आर्थिक तंगी की दशा में अपने घर पर किटी पार्टी और जिम इंस्ट्रक्टर का काम करता है। सामान्य बुद्धि का आदमी भी यह मानता है कि आईआईएम के टॉपर में इतनी अक्ल तो होती है कि जरूरत पड़ने पर वह कोई ऐसा काम करें, जिसमें कम समय लगे और आर्थिक लाभ भी हो सके। करीना कपूर को लक्मे कंपनी का बेस्ट मार्केटिंग अवार्ड मिलता है और वह सफोला वंâपनी के लिए भी काम करते है। फिल्म में कल्पतरु बिल्डर्स, लक्मे, सफोला, विस्तारा एयरलाइंस और अमिताभ तथा जया बच्चन का विज्ञापन साफ नजर आता है। इस फिल्म में काम करके अमिताभ ने हाजिरी भी दर्ज कर दी और बाल्की से रिश्ता भी निभा लिया। फिल्म में अमिताभ बच्चन को अमिताभ बच्चन ही दिखाया गया है, जिनसे मिलना किसी के लिए भी गौरव की बात हो सकती है। अर्जुन कपूर को एक सामान्य व्यक्ति कबीर बंसल के रूप में अमिताभ बच्चन से मिलने उनके घर जाते दिखाया गया है।

फिल्म में करीना कपूर अपनी भूमिका के अनुरूप ही नजर आई। उनकी एक्टिंग भी बढ़िया है। अर्जुन कपूर ने इस फिल्म में कमाल कर दिया। फिल्म की लोकेशन्स अच्छी हैं। रेलवे म्युजियम में रोमांस के सीन और करीना कपूर के घर को रेलवे म्युजियम की तर्ज पर सजा हुआ देखना अच्छा लगता है।

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