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वीरप्पन पर बनी रामगोपाल वर्मा की डाक्युड्रामा वीभत्स है। इसका संगीत कानफाड़ू है और गाने बकवास। बार-बार वहीं वीभत्स दृश्य। पुलिसकर्मियों के हाथ-पैर कुल्हाड़ी से काटना और पत्थर से सिर कुचलकर मार डालना। हाथी के दांत के लिए वह जिंदा हाथी के दांत कुल्हाड़ी से काट डालता है। चंदन तस्कर के रूप में कुख्यात वीरप्पन के इस कृत्य का जिक्र तक नहीं। लीसा रे जैसी अभिनेत्री भी कुछ नहीं कर पाई। कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों के कुछ दृश्य तो चंबल के बीहड़ों जैसे लगते हैं। कई बार तो लगता है कि वीरप्पन को महिमामंडित करने की कोशिश की जा रही है। फिल्म का पूरा नाम ‘वीरप्पन, नोन लाइक हिम एवर इग्जिस्टेड’ है।

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रामगोपाल वर्मा ने वीरप्पन के बारे में रिसर्च ठीक से नहीं की, ऐसा लगता हैं। हां, दक्षिण की तीन भाषाओं में यहीं फिल्म बनाकर कारोबार की उनकी रणनीति बढ़िया हैं। फिल्म में कहीं-कहीं वीरप्पन को गब्बर की तरह दिखाने की कोशिश भी की गई हैं, जो हास्यास्पद लगती है। लगता है रामगोपाल वर्मा का शोले का खुमार अभी भी उतरा नहीं।

वीरप्पन श्रीलंका के आतंकी प्रभाकरण से बहुत प्रभावित था। इससे मिलने के बहाने ही उसे घेरकर मारा गया, लेकिन रॉबिनहुड जैसी छवि उसकी बिल्कुल नहीं थी। वह जल्लाद, धोखेबाज किस्म का डकैत था। दक्षिण के अभिनेता राजकुमार का अपहरण करने और 9 करोड़ की फिरौती लेने के मामले में वह चर्चा में रहा। फिल्म के अनुसार वह रजनीकांत और कांची स्वामी का अपहरण करके करोड़ों कमाना चाहता हैं। राजकुमार के अपहरण में मिली फिरौती में से उसे केवल सात लाख रुपए ही मिले थे। एक पूर्व मंत्री और दो आईपीएस अधिकारियों की हत्या करने वाले वीरप्पन के बारे में जब मीडिया में खबरें छपती, तब वह बहुत उत्साहित हो जाता और इसे अपनी प्रेरणा मानता। फिल्म में सुरक्षाकर्मियों के बलिदान और साहस की कहानियां गायब हैं। कहते हैं कि वह गॉडफादर फिल्म से बहुत प्रभावित था और सैकड़ों बार उसे देख चुका था। वह धार्मिक किस्म का आदमी भी था और रोज काली की पूजा करता था। वह कर्नाटक संगीत का दीवाना ही था और फूलनदेवी से प्रभावित होकर राजनीति में आना चाहता था। वीरप्पन कई जानवरों और पक्षियों की आवाज हूबहू निकाल लेता था और अपनी इस कला का उपयोग उसने अपने भागने में कई बार किया। इन सब बातों का इस फिल्म में कहीं संदर्भ नहीं है।

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वास्तव में असली वीरप्पन बड़े पुलिस और सैन्य अधिकारियों की हत्या के बाद ज्यादा चर्चा में आया था। वह बड़े अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण का संदेश भेजता और मौके पर धोखे से हत्या कर डालता। उसने धोखे से कई बड़े अधिकारियों की हत्या की। लगभग अनपढ़ वीरप्पन ने मीडिया का उपयोग अपने पक्ष में किया था। कुछ मीडियाकर्मियों को उसने जंगल में बुलाकर इंटरव्यू भी दिए थे। वीरप्पन के बारे में सुना रघुराम की किताब पर यह फिल्म आधारित है।

वीरप्पन की भूमिका निभाने वाले हरियाणवी संदीप भारद्वाज ने असली वीरप्पन जैसा लुक दिया हैं। वीरप्पन बनने के लिए उन्होंने अपना वजन काफी कम किया। तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के घने सत्यमंगलम् जंगलों में इस फिल्म की शूटिंग हुई, जिसमें वन विभाग, सीमा सुरक्षा बल के जवानों और पुलिस ने भी काफी मदद की।

रामगोपाल वर्मा ने वीरप्पन के सफाए के बाद कन्नड़ में एक फिल्म बनाई हैं। कन्नड़ फिल्म का नाम मेकिंग वीरप्पन रखा गया। इस नाम पर बहुत आपत्तियां की गई। बाद में रामगोपाल वर्मा सफाई देते फिरे की वे वीरप्पन को महिमामंडित नहीं कर रहे थे। जयपुर में रामगोपाल वर्मा ने हाल ही में कहा था कि वीरप्पन भले ही दुनिया के लिए वीलेन था पर मेरे लिए तो वह अच्छा था, क्योंकि उसकी वजह से मुझे फिल्म बनाने का मौका मिला। केरल, तमिलनाड और कर्नाटक में यह फिल्म चलेगी, इसमें कोई शक नहीं है। डाकुओं के जीवन पर अनेक बेहतर फिल्में बन चुकी हैं। उनके आगे यह फिल्म फीकी है।

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इस फिल्म में वीरप्पन की पत्नी की भूमिका उषा जाधव ने बखूबी निभाई है। सचिन जोशी ने पुलिस अधिकारी और लीसा रे ने वीरप्पन द्वारा मारे गए पुलिस अधिकारी की पत्नी की भूमिका निभाई, जो वीरप्पन को पकड़वाने के लिए जासूसी करती हैं।

फिल्म के गाने में वीरप्पन का वीर, वीर बार-बार दोहराया गया है। पुलिस और स्पेशल टास्क फोर्स के अधिकारियों को मूर्ख साबित करने की कोशिश की जाती है। ऐसा लगता है कि 2007 में आई रामगोपाल वर्मा की आग के बाद यह रामगोपाल वर्मा की वापसी की राख है। वैसे भी पिछले नौ साल से रामगोपाल वर्मा अपने ट्वीट के लिए ही चर्चा में रहे हैं। कभी वे अमिताभ बच्चन के लिए गालियां लिखते रहे, तो अब असम की बीजेपी विधायक और अभिनेत्री अंगूरलता डेका के बारे में ऊल-जलूल कह रहे हैं।

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