
जिन लोगों ने कबाली देखने के लिए छुट्टी ली होगी या जिन्हें छुट्टी मिली होगी, समझो, उनका दिन बेकार गया। अपराध और अपराधी का ऐसा महिमामंडन न तो झेलनीय है और न सराहनीय। रजनीकांत के भक्त सचमुच में बावले ही है, वरना ऐसी कोई खास बात इस फिल्म में है नहीं कि फिल्म की तारीफ की जाए। देखते है कि मार्केटिंग और विज्ञापन के भरोसे यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कितनी हिट हो पाती है।
अपराध, अपराधी, डॉन, डॉन का परिवार, ड्रग तस्करी, लड़कियों की खरीद फरोख्त, गोलियां, तलवारबाजी, फाइटिंग, नकली भावनाएं, मलेशिया, थाईलैण्ड, हांगकांग, चेन्नई, पुडुचेरी और रजनीकांत को लेकर कई फिल्में बन चुकी है। अगर आप रजनीकांत के भक्त नहीं है, तो सच मानिए, इस फिल्म को इंटरवल तक झेलना भी कठिन हो जाता है।

मलेशिया में रबड़ की खेती के लिए भारत से ले जाए गए गुलामों की संतान के रूप में रजनीकांत मजदूर से मजदूर-नेता बन जाता है और फिर हालात उसे अंडरवल्र्ड की दुनिया में धकेल देते है। 25 साल जेल में बिताकर जब वह छूटता है, तब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी मरी नहीं, बल्कि जीवित है। दूसरे अंडरवर्ल्ड गिरोह उसकी जान लेने पर आमादा रहते है और वह समाजसेवक टाइप व्यक्ति हो जाता है। हालात फिर उसे अपराध के लिए बाध्य करते है और जैसा कि अंडरवर्ल्ड के लोगों के साथ होता है, रजनीकांत भी काफी खून-खराबे के बाद आजाद घूमता रहता है। उसे न मलेशिया की पुलिस पकड़ती है, न थाईलैण्ड की।
रजनीकांत ने इस फिल्म में एक वृद्ध डॉन का रोल किया है। बाकी की कहानी फ्लेशबैक में चलती है। रजनीकांत समझ गए है कि अब उन्हें अपनी उम्र के हिसाब से ही रोल चुनने चाहिए। दर्शकों को उनके वृद्ध डॉन वाले सीन ज्यादा पसंद आए और जिन दृश्यों में उन्होंने युवा दिखने की कोशिश की, वे कम पसंद आए। दक्षिण भारत में इस फिल्म को चाहे जैसी ओपनिंग मिली हो, हिन्दी भाषी इलाके में इसे वैसा प्रतिसाद मिलने से रहा।
फिल्म का पार्श्व संगीत किसी लोहार की दुकान जैसा भारी है। मधुरता गायब। गाने ठीक-ठीक है। राधिका आप्टे, दिनेश रवि, धंसिका, क्लेयरसन, प्रकाश राज आदि की भूमिका भी ठीकठाक ही है। फिल्म में यादगार संवाद के रूप में एक ही संवाद याद रहा- हर एक पक्षी रोज एक बीज लेकर उड़ता है और उस बीज में एक पूरा जंगल छिपा होता है।