
उम्र के 40वें साल में विद्या बालन ने ‘साड़ी वाली भाभी आरजे’ का रोल ठीक ही किया है। डर्टी पिक्चर और बेगम जान से अलग हटकर इसमें विद्या बालन का रोल ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ की आरजे जैसा है। मुन्ना भाई में वह गुड मार्निंग मुंबई कहती थी, इसमें साड़ी वाली सेक्सी भाभी के अंदाज में हैलो कहती है, रात के शो में अजीबो-गरीब टेलीफोन कॉल का जवाब देती है और गाने भी सुनवाती है। साफ-सुथरी कॉमेडी फिल्म है, जिसके निर्माता और निर्देशक सुरेश त्रिवेणी है, जो विज्ञापन फिल्में बनाते हैं। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार मुंबई के सुदूर विरार उपनगर में रहता है। आय का एक मात्र स्त्रोत सुलोचना के पति अशोक की 40 हजार रुपए की तनख्वाह है। एक बेटा स्कूल जाता है। 3 बार 12वीं में फेल सुलोचना किसी तरह अपने परिवार की गाड़ी हंसते-खेलते चलाती है। कभी वह निंबू दौड़ जीतती है, कभी अंताक्षरी। बक-बक करने वाली सुलोचना किसी तरह एक एफएम रेडियो में आरजे बन जाती है।

पारिवारिक कहानी बनाने के चक्कर में निर्माता-निर्देशक पुरानी पारिवारिक कहानियों के फॉर्मूले से बाहर नहीं आ पाए। जैसे ही सुलोचना नौकरी करने लगती है, उसे अपने परिवार का विरोध सहना पड़ता है। उसके पिता और दो शादीशुदा बहनें भी उससे यह नौकरी छुड़वाना चाहते है। उधर सुलोचना नौकरी करती है और इधर उसके पति की नौकरी संकट में पड़ जाती है। इकलौता बेटा बिगड़ जाता है और स्कूल से निकाले जाने की नौबत आ जाती है।

कुल मिलाकर पूरी कहानी यह कहना चाहती है कि औरतों का नौकरी करना परेशानियों को जन्म देने वाला होता है। वास्तव में ऐसा नहीं होता। लाखों महिलाएं नौकरी करते हुए घर-परिवार में संतुलन बनाए रखती हैं। परिवार का सहयोग मिलता है और गृहस्थी की गाड़ी चलती रहती है, लेकिन फिल्म में ट्विस्ट देने के लिए शायद कोई दूसरा विचार निर्देशक को सूझा ही नहीं। नतीजा यह निकला कि फिल्म पारिवारिक मसाला फिल्मों के फॉर्मूले में उलझ गई। टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ दिलचस्प दृश्य अवश्य पेश किए गए, लेकिन उससे फिल्म सामान्य से आगे नहीं बढ़ पाई।
फिल्म में रेडियो जॉकी की भूमिका पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया। रेडियो पर रात्रिकालीन कार्यक्रम पेश करने वाली महिला जॉकी के बारे में लोग जिस तरह की बातें करते दिखाए गए है, वैसे लोग कम ही होंगे। रेडियो जॉकी की नौकरी सभी वर्ग के लोगों में ग्लैमर का केन्द्र होती है। उसे कोई हेय मानता हो यह बात गले नहीं उतरती। निर्देशक ने असली रेडियो जॉकी मलिष्का मेंडोंसा को भी छोटा सा रोल देकर विश्वसनीयता बनाने की कोशिश की। विद्या के पति के रूप में मानव कौल ने अच्छा अभिनय किया।

फिल्म की उल्लेखनीय बात यह है कि विद्या बालन के आसपास घूमती हुई कहानी टुकड़ों-टुकड़ों में अनेक ऐसे दृश्य भी दिखा देती है, जो समाज में बदलाव के द्योतक है, जैसे आरजे के रूप में नाइट शिफ्ट के लिए पिक और ड्रॉप करने वाली टैक्सी की ड्राइवर एक महिला है, जो अपने साथ पेप्पर स्प्रे रखती है, ताकि कोई छेड़छाड़ की कोशिश न करे। कुछ ही दृश्यों बाद उसकी निजी पीड़ा भी सबके सामने पेश आती है। प्राइवेट कंपनियों में कर्मचारियों का जिस तरह शोषण होता है, उसकी झलक मानव कौल की नौकरी में नजर आती है। जहां कोई जॉब सिक्युरिटी नहीं और कोई भविष्य की व्यवस्था भी नहीं।
बातूनी, उत्साही, खुशमिजाज विद्या बालन नियमित रूप से नए-नए व्यापार करने की सोचती रहती है और कई में नाकाम भी होती है, कभी वह टैक्सी कंपनी की मालकिन बनना चाहती है, तो कभी टिफिन सप्लाई करने वाली कारोबारी। हल्की-फुल्की मजेदार फिल्म को गंभीर मोड़ देने के चक्कर में फिल्म लड़खड़ा जाती है। नेहा धूपिया का साथ भी कुछ खास मदद नहीं कर पाता। यह बात भी नजर आती है कि निजी एफएम रेडियो वाले अपने आरजे की असलियत छुपाते हुए उनका एक नया रूप ही पेश करना चाहते है, जो उनकी ब्रांडिंग का हिस्सा होता है।
तुम्हारी सुलु विद्या बालन पर केन्द्रित फिल्म है और पूरी फिल्म उन्हीं के कंधों पर टिकी है। साफ-सुथरी पारिवारिक फिल्म देखने वालों को यह पसंद आएगी। फिल्म के गाने दिलचस्प है।