
यह तो अच्छा हुआ कि शरदचन्द्र चटर्जी 1938 में ही स्वर्ग सिधार गए। आज अगर वे जिंदा होते, तो सुधीर मिश्रा की दास देव देखकर हावड़ा ब्रिज से कूदकर आत्महत्या कर लेते। 1917 में देवदास उपन्यास बांग्ला भाषा में छपकर आया था और अपने जीते-जी शरदचन्द्र उस पर बनी चार फिल्में देख चुके थे। देवदास, पारो और चन्द्रमुखी के साथ इतना व्याभिचार इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ होगा। ये तीनों काल्पनिक पात्र हैं, सुधीर मिश्रा ने इन काल्पनिक पात्रों के साथ जैसी कल्पनाएं की है, वह कल्पना से परे है।
देवदास पर 1928 में बनी मूक फिल्म से लेकर अब तक 16 फिल्में बन चुकी है। ये फिल्में हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, असमिया, तमिल, तेलुगु, मलयालम आदि में है। दास देव को देवदास का ‘भैया संस्करण’ कह सकते हैं। बांग्ला संस्कृति का उत्तर भारतीय संस्करण। इसमें राहुल भट्ट देवदास बने हैं, अदिति राव हैदरी चांदनी उर्फ चन्द्रमुखी और ऋचा चड्डा पारो। सौरभ शुक्ला, अनुराग कश्यप, सोहैला कपूर, दलिप ताहिल और विनीत कुमार सिंह सहयोगी भूमिकाओं में हैं। बंगाली जमींदार परिवार की कहानी उत्तरप्रदेश आते-आते मुख्यमंत्री और दबंगों की कहानी बन जाती है।

देवदास मुख्यत: प्रेम त्रिकोण पर थी। यह फिल्म प्रेम छोड़कर सब पर है। मुख्यमंत्री का पद, जमींदारी, खानदान, उत्तराधिकार, पद, नशा, अय्याशी, बांध, किसान, भूमि अधिग्रहण, बॉक्साइड, षड्यंत्र, व्याभिचार, हत्या, नरसंहार, धोखा आदि-आदि। कोठियां, होटल, शराब की महफिलें, हेलीकॉप्टर, कार, बंदूकें, अस्पताल आदि इसके गढ़ है। ऐसे में शरदचन्द्र के देवदास वाला प्रेम तो गया तेल लेने।

सुधीर मिश्रा कहते हैं कि यह फिल्म डार्क और इंटेंस है। इसके प्रेम में ट्रेजडी और षड्यंत्र का मिला-जुला रूप है। कोई भी किरदार दूध का धुला नहीं है। कहानी परत दर परत आगे चलती है। यह देवदास पर आधारित रोमांटिक थ्रिलर है। देवदास का देव शराब के नशे का आदी रहता है। इस फिल्म में वह शराब से सत्ता के नशे पर शिफ्ट हो जाता है। यहां उसका पारो से रोमांस पीछे छूट जाता है, लेकिन अंत में प्रेम सत्ता पर भारी बैठता है। सुधीर मिश्रा की बात पर भरोसा करने के लिए फिल्म देखने वालों की कमी शायद नहीं है।
अगर आपको अदरक, लहसुन, हिंग और अजीनोमोटो से बघारी गई फालूदा कुल्फी पसंद है, तो यह फिल्म आपके लिए ही है।
हे शरदचन्द्र चटर्जी की आत्मा, इन्हें माफ कर दो, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे है?