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एकता कपूर और फिल्म बनाने वाली टीवी चैनल कंपनी से दर्शकों का सवाल है कि मेंटल है क्या? जो ऐसी फिल्में हमें झिलवाने पर आमादा हो। इसे एक्शन, सस्पेंस, थ्रिलर फिल्म बताया जा रहा है। फिल्म में राजकुमार राव, कंगना रनौत और 10-12 कॉकरोचों ने अच्छा काम किया है। हालांकि टाइटल के दौरान यह दिखाया गया है कि फिल्म बनाने के दौरान असली कॉकरोच इस्तेमाल नहीं किए गए, बल्कि ग्रॉफिक्स का इस्तेमाल किया गया। फिल्म में कंगना रनौत को कागज के काॅकरोच बनाते हुए भी दिखाया गया है। वह भी तब जब कंगना को काॅकरोच से चिढ़ रहती है।

40 साल पहले भी ऋषि कपूर ने 'झूठा कहीं का' नाम की फिल्म में काम किया था, जिसमें उनके साथ नीतू कपूर प्रमुख भूमिका में थीं। रवि टंडन के निर्देशन में बनी उस 'झूठा कहीं का' और इस 'झूठा कहीं का' में ज़मीन-आसमान का अंतर है। यह पंजाबी ब्लॉकबस्टर फिल्म 'कैरी ऑन जट्टा' की रीमेक है। पुरानी फिल्म की तरह ही इसमें भी ऋषि कपूर प्रमुख भूमिका में हैं, लेकिन वे हीरो नहीं हैं। हालांकि फिल्म उन्हीं के कंधे पर सवार है। कारण यह है कि लिलेट दुबे, सनी सिंह, ओंकार कपूर, निमिषा मेहता आदि सभी नए कलाकार इस फिल्म में है। जिमी शेरगिल, मनोज जोशी और राकेश बेदी की भी छोटी भूमिकाएं हैं। अंत में सनी लियोनी का एक आइटम सांग भी डाल दिया गया है , जिसे देखने के लिए दर्शक थियेटर में रुकने की जहमत नहीं उठाते।

बिहारी केवल ओरिजनल होते हैं। उनकी नकल कोई नहीं कर सकता। ऋतिक रोशन भी नहीं। यह बात सुपर 30 में साबित हो गई। ऋतिक ने भले ही श को स, छह को छौ और नर्वस होने को नरभस होना उच्चारित किया हो, वे आनंद कुमार कही से नहीं लगे, वे ऋतिक रोशन ही लगते रहे। बाॅयोपिक के दौर में आनंद कुमार की इस बॉयोपिक में बहुत सारे झोल हैं, लेकिन फिल्म तो फिल्म ही है। निर्देशक विकास बहल ने क्वीन फिल्म में अपने निर्देशन का जादू दिखाया था। इसमें वैसा जादू नहीं बना पाए, जो कुछ जादू है, वह आनंद कुमार का ही है और बिहार के लोग जानते हैं कि आनंद कुमार के बारे में वे कौन से तथ्य हैं, जो फिल्म में नहीं दिखाए गए। इस फिल्म में बताया गया है कि कोचिंग कोई शिक्षा दान नहीं और न ही कोई कारोबार है। यह एक संगठित माफिया है। पर्सनल ट्यूशन तो पहले भी पढ़ाई जाती थी और शिक्षकों को उसकी फीस भी मिलती थी, लेकिन अब जो कोचिंग क्लासेस का कारोबार है, उसमें षड्यंत्र, खून-खराबा, कालाधन और राजनीति सभी कुछ है। कोचिंग माफिया जिस तरह पेपर सेट करवाते है, टेस्ट पेपर की मार्किंग में पक्षपात की साजिशें रचते है और प्रतिस्पर्धी संस्थानों को बदनाम करते हैं, उसकी मामूली झलक इस फिल्म में है।

जो लोग केवल मनोरंजन के लिए फिल्में देखते है, वे आर्टिकल 15 न देखें। इसमें आम मसाला फिल्मों जैसा कोई मसाला नहीं है। न फूहड़ता, न किसिंग सीन, न फाइटिंग, न नाच-गाने, लेकिन फिर भी यह फिल्म देखने लायक है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि इस देश में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के भी आधार पर किसी भी व्यक्ति से कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद देश में भेदभाव जारी है। यही बात फिल्म कहती है।

इस शुक्रवार कुछ नया नहीं घटा। न निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट में, न बॉक्स ऑफिस में। बजट 90 के दशक का है और फ़िल्म भी। संजय लीला भंसाली की भानजी और जावेद जाफरी के बेटे को लेकर गुलशन कुमार के भाई किशन कुमार ने 15 साल पुरानी तमिल फिल्म '7जी रेनबो कॉलोनी' का जो रीमेक बनाया है उसे देखना न देखना बराबर है।

कबीर सिंह देखकर निकलते वक्त दो दर्शक बात कर रहे थे कि बन गए ना ट्रेलर देखकर उल्लू। 3 घंटे पका दिया। तेलुगु फिल्म अर्जुन रेड्डी का रिमेक कबीर सिंह बेहद इरीटेटिंग फिल्म है। पता नहीं तेलुगु में यह हिट क्यों हुई? अच्छा हुआ जो रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर ने इससे कन्नी काट ली। करीब 3 घंटे की फिल्म इंटरवल के बाद तो बेहद पकाऊ लगती है, जिसमें हीरो के पास यही काम रहता है - शराब पीना, सिगरेट पीना, ड्रग्स लेना और अपने पिता, मां, दादी, भाई और दोस्तों की बेइज्जती करना। अरे भाई, तुझे शराब पीना है तो पी ले, हमारे दिमाग का दही तो मत कर। हीरो भी एमएस डॉक्टर है, विशेषज्ञ है। बिना दारू पिये ऑपरेशन थिएटर में नहीं जाता, लेकिन अगर कोई नर्स लिपस्टिक लगाकर आ जाए, तो उसे आउट कर देता है। नशे में वह ऑपरेशन थिएटर में थड़ाम हो जाता है और फिर भी नर्सों को इंस्ट्रक्शन देते हुए ऑपरेशन खत्म करवाता है।