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समृद्धि के लिए शांति जरूरी है और शांति के लिए युद्ध। वूâटनीतिक कौशल की अपनी महत्ता है, लेकिन युद्ध की जगह युद्ध ही जरूरी होता है। हर युद्ध जीत के लिए, केवल जीत के लिए लड़ा जाता है। आजादी के बाद हमने पाकिस्तानी फौजों से तीन युद्ध (1947-48, 1965 और 1971) लड़े व जीते और चीन से एक युद्ध (1962) लड़ा और मात खाई। चीन से हार का खामियाजा तो हमने हजारों जवान और जमीन खोकर भुगता ही, वूâटनीतिक कौशल के अभाव में जीते हुए युद्ध का भी अपेक्षित लाभ नहीं उठा सके और न ही दुश्मन को अपेक्षित क्षति पहुंचा सके।

इन लड़ाइयों में हमने अपने बहादुर सैनिक खोये, जमीन खो दी और इस सबसे बढ़कर सैन्य बलों का मनोेबल तोड़ा। १९४७-४८ : सत्ता के हस्तांतरण के वक्त कश्मीर, हैदराबाद, गोवा, दमन, दीव, पांडिचेरी और सिक्किम भारत का हिस्सा नहीं थे।

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कश्मीर में राजा हरिसिंह अपनी पृथक पहचान के लिए अड़े हुए थे और कांग्रेस का उनके प्रति कोई कड़ा रूख नहीं था। गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल उन्हें भारत के साथ मिलने पर दबाव डाल रहे थे लेकिन हरिसिंह ने विलय संधि पर हस्ताक्षर किए 26 अक्ॅुबर 1947 को जब पाकिस्तानी फौज के बहकावे में पाकिस्तानी कबाइलों ने कश्मीर में घुसकर हमले करना शुरू किया था। हरिसिंह के सामने तब भारत या पाकिस्तानी में विलय के सिवाय चारा नहीं था, उन्होंने भारत में विलय में ही भलाई मानी। विलय संधि पर हस्ताक्षर होते ही भारतीय वायु सेना के नं. १२ स्क्वाड्रन के तीन डकोटा विमान भारतीय जवानों की पहली बटालियन लेकर श्रीनगर विमानस्थल पर उतरे और हमलावरों को खदेड़ने का काम शुरू किया। तत्कालीन रायल इंडियन एअरफोर्स की मदद से थल सेना के जवानों ने श्रीनगर, बड़गांव, बारामूला, उड़ी, सोपोर, कुपावड़ा श्रेत्रों में घुसे कबायलियों और पाकिस्तानी सैनिकोें को कश्मीर के बाहर निकाल दिया। हमारी सेनाएं कबायली हमलावरों और पाकिस्तानी सैनिकों को पूरे कश्मीर से बाहर करने की तैयारी में संघर्ष रत थी कि बिना किसी निष्कर्ष के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ॅ्र में युद्धविराम की घोषणा कर दी। 31 दिसम्बर 1948 की रात के 12 बजे से यह युद्ध विराम लागू हो गया। फौजें वापस लौॅ आई और पूर्ण कश्मीर को पाकिस्तानी से मुक्त कराने की योजना धरी रह गई। 

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दूसरा युद्ध - 1962: आजाद भारत का यह दुसरा युद्ध था, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधान मंत्रित्व काल में चीन के साथ लड़ा गया था। यह नेहरू के पंचशील सिद्धांतों और गुटनिरपेक्षता की भावना की अग्निपरीक्षा थी। यह युद्ध भारत के किसी सैनिक गुट में शामिल नहीं होने का नतीजा था। 1950 में सरकार ने सेना की भूमिका यो तय की - ‘‘सेनाओं का पहला कार्य है, अगर विदेशी आक्रमण हो तो भारत की उससे रक्षा करना और दूसरा कार्य है सरकार के आग्रह पर शांतिपूर्ण कार्यों के लिए उसकी मदद करना।’’ सेनाध्यक्षों को आदेश दिया गया कि प्रशिक्षण के दौरान भी जवानों को कभी यह नहीं कहा जाए कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन है। पं. नेहरू सेनाओं के प्रभाव से मन ही मन आका्रंत रहते थे। वे सदा शांति की बातें कहते थे और विश्वास रखते थे कि पड़ौसी देशों के साथ उपजी समस्याओं को वूâटनीतिक कौशल के जरिए हल किया जा सकता है। उन्ंहोंने सेना पर खर्च बढ़ाने के बजाए विकास कार्यों पर खर्च करना ज्यादा महत्वपूर्ण लगा। सेनाओं के आधुनिकीकरण और जवानों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। 1942 से 1956 तक चीन से भारत के संबंध बहुत मधुर रहे। चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई नेहरूजी को मित्रवत मानते थे। यह नेहरूजी के पंचशील सिद्धान्तों की उपलब्धि थी और भारत की सुरक्षा के साथ एक फरेब।

पाकिस्तान ने 1954 में अक्साई चीन नामक भारतीय भूभाग पर कब्जा करने की कोशिश की थी। जब नेहरूजी को इसकी भनक मिली तो उन्होंने राष्ॅ्र को आगाह करने के बजाय खुद उस इलाके दौरा किया। चारों तरफ बर्पâ ही बर्पâ थी और नेहरू ने अपने साथियों और सेना को समझाया कि जिस जगह फसल तो क्या हरी घास तक नहीं उग सकती, उस जगह पर कब्जे के लिए कौन लड़ना चाहेगा। नेहरू जी के इस रवैये के आगे सेना के शीर्ष अधिकारी बेबस थे। नेहरूजी ने कृष्ण मेनन को रक्षामंत्री बनाया था, जो वामपंथी विचारों के थे और नेहरू को लगता था कि चीन से निपटने में कृष्ण मेनन अकेले ही सक्षम है। पाकिस्तान से सुरक्षा के बारे में नेहरूजी का मत था कि हमें केवल इतनी सेना रखनी चाहिए जो पाकिस्तानी पर भारी पड़ सके। पं. नेहरू द्वारा कृष्ण मेनन को रक्षा मंत्री बनाया जाना शायद एक बड़ी भूल थी क्योंकि मेनन से सेनाध्यक्षों के साथ कभी भी अच्छा सलूक नहीं किया और यही बताने में लगे रहे कि सेनाध्यक्षों की तुलना में मैं राष्ट्र की सुरक्षा के बारे में ज्यादा जानता हूं। थल सेनाध्यक्ष जनरल थिर्मैया, जिन्हें लोग ृिम्मी के नाम से जानते थे, कृष्ण मेनन के कोपभाजन बने। जनरल थिमैया सेनाध्यक्ष को चीन और पाकिस्तान के सैन्य खतरे से आगाह कर रहे थे और मेनन उसे कपोल कल्पना बताते हुए भारतीय थल सेनाध्यक्ष की बातों की अनसुनी कर रहे थे। हालात यह हुए कि थल सेनाध्यक्ष को इस्तीफा दे देना पड़ा (जो बाद में वापस ले लिया गया) लेकिन इसका दुष्प्रभाव सेना पर पड़ा और सेनाधिकारियों का मनोबल खंडित हो गया। भारत के सामने सैटों और सिएटो जैसे सैनिक गुटों में शामिल होने का प्रस्ताव था, जिसे भारत ने नहीं माना। पाकिस्तान ने पेशावर में अमरीका को सैनिक बेस बनाने की अनुमति दे दी और 800 पैटन टैंक, आधुनिकतम तोपें, बमवर्षक विमान तथा आधुनिकतम लड़ावूâ विमान हासिल कर लिए। उसके जवाब में भारत के पास एक भी आधुनिकतम हथियार नहीं था। इस सबका संदेश चीन ने यह पाया कि भारत कमजोर, अप्रशिक्षित और पुराने साजो सामान से लिप्त सुरक्षा प्रणाली रखता है और उसके भूभाग पर कभी भी कब्जा किया जा सकता है। 20 अक्ॅूबर 1962 जब चीन ने हमला किया उसके पूर्व वह सियाचिन इलाके में भारतीय भूभाग पर अपनी चौकियां बना चुका था। भारतीय सीमा की रक्षा के प्रति हम कितने सचेत थे, इसका अंदाज इसी बात से लग सकता है कि नेफा में हमने सुरक्षा के नाम पर केवल एक ब्रिगेड (करीब 5000 सैनिक) ही तैनात किये थे। असम रायफल्स के जो जवान हमने सीमा पर तैनात किए थे, वे वहां बीवी, बच्चों सहित रह रहे थे। जाहिर है हम चीन सीमा को महपूâज इलाका मान रहे थे। 20 अक्टूबर 1962 को हमलावर चीनी सैनिकों के पास आधुनिक हथियार थे और वे बड़ी संख्यां में थे। हमारे सैनिक वहां बिना तैयारी के भेजे गए थे। जहां बारहों महीने बर्पâ ढंकी रहती है, वहां भारतीय सैनिकों के पास चमड़े के एक जोड़ी जूते, सूती कपड़े और दो कम्बल मात्र थे। हथियारों के नाम पर उनके पास 303 मैक बंदूवेंâ थी और हर जवान को ५०-५० गोलियां दी गई थी। उनके पास युद्ध के स्थान के नक्शे अधूरे थे और रसद तथा गोला बारूद की पूर्ति की व्यवस्था नहीं थी। उन जवानों को प्रतिवूâल साहौल में लड़ने का प्रशिक्षण पूरा नहीं था। हमारे अनेक जवान सर्द मौसम की वजह से मौत के शिकार हुए। चीन से युद्ध हारने के बाद क्या क्या हुआ यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन एक सबसे बड़ा सबक हमने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने का सीखा और उस दिशा में सोचना शुरू किया।

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तीसरा युद्ध - 1965: आजाद भारत के तीसरे और पाकिस्तान से भारत के दूसरे युद्ध की शुरूआत एक सितम्बर 1965 को हुई थी, लेकिन गुजरात राजस्थान सीमा पर पाकिस्तान ब्रिगेड अ‍ॅैक इसके पहले ही होते रहते थे। 8 और 9 अप्रैल 1965 की रात्रि में पाकिस्तानी सेना ने वंâजरकोट और सरदार पोस्ट पर हमला किया था। वंâजरकोट में भारत की कोई जवाबदार बचाव पंक्ति नहीं थी, केवल सीआरपीएफ के जवान थे। मावूâल जवाब न मिलने पर पाक का हौसला बढ़ गया था। दरअसल वह भारतीय सुरक्षा व्यवस्था की थाह ले रहा था। इसके पहले दिसम्बर १९६४ में भी पाक फौजें ब्रिगेड अटैक कर चुकी थी और भारत की नं. 31 इंडिपैंडेट ब्रिगेड अहमदाबाद से धांगध्रा जा रही थी। इंडिपैंडेट ब्रिगेड के जवानों को वंâजरकोट भेजा जाना था, लेकिन सरकार ने उसे सीधे जाने की अनुमति यह कहकर नहीं दी कि युद्ध के माहौल से शांति व्यवस्था भंग होगी और लोग विकास कार्यों में विनियोग नहीं करेंगे। गुजरात के मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता ने भुज क्षेत्र में खुद हालात का जायजा लेना चाहा और विमान से दौरा शुरू किया। जब श्री मेहता का नागरिक विमान पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में गिर गया और श्री मेहता की मृत्यु हो गई तब कहीं केन्द्र सरकार को महसूस हुआ कि मामला गंभीर है।

पहली सितम्बर 1965 को जब पाकिस्तान ने छम्ब क्षेत्र में टैंकों, तोपों और हवाई जहाजों से हमले शुरू किए तब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था हम नाश्ता अमृतसर में, दोपहर का खाना जयपुर में ओर रात का भोजन दिल्ली में करेंगे। लेकिन शाम होते होते पाकिस्तानी शेखचिल्लियों के होश फाक्ता हो गए।

पहले ही दिन चार भारतीय वेम्पायर विमानों ने शाम 5 बजकर 19 मिनट से पाकिस्तान पर बम बरसाना चालू कर दिया था। इन विमानों ने एक ही दिन में 26 उड़ानें भरी। इस कारण पाकिस्तान की सेनाओं का आगे बढ़ना रूक गया। अमरीका में बने सैबरजैट विमानों को पुराने भारतीय नैट विमानों ने तबाह करना शुरू कर दिया। यह पहला युद्ध था जिसमें भारतीय थल सेना को वायु सेना का पूरा पूरा सामरिक सहयोग मिला। पाक फौजी ठिकानों, टैंकों के दोस्तों, आपूर्ति केन्द्रों, हवाई अड्डों पर भारतीय वायु सेना ने जर्बदस्त प्रहार किए। प्रâांस की मदद से निर्मित औले हेलिकाप्टरों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दो सप्ताह तक चले इस युद्ध में तत्कालीन कर्नल सुंदरजी ने की वन महार रेजिमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूरे युद्ध में भारतीय सेना बुलंदी पर थी कि अमरीका के भारी दबाव के कारण प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी।

एक बार फिर अपनी जीती हुई बाजी ताशवंâद समझौते में छोड़ दी। हमने पाकिस्तानी को उसका सब कुछ लौॉ दिया और पाकिस्तानी हमले में हुई भारी क्षति की पूर्ति का दावा तक पेश नहीं किया। जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और गुजरात में नागरिकों को युद्ध में क्षति के एक अंश का चुकारा भारत सरकार ने खुद किया। इस तरह युद्ध में एक शानदार जीत की पुस्तक का अंतिम अध्याय वूâटनीतिक पराजय से हुआ।

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चौथा युद्ध - 1971 : भारतीय युद्ध कौशल और वूâटनीतिक विफलता का सबक १९७१ में हमने भारी कीमत चुकाकर सीखा। इस युद्ध में हमारा एक लक्ष्य ही पूरा हुआ है - बांग्लोदश की मुक्ति का। पाकिस्तान के टुकड़े-टुकड़े कराकर पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्र में पूर्ण शांति की योजना भी फिर अधूरी ही रही। चार युद्धों में यह एक युद्ध था जो हमें सबसे ज्यादा चौकस कर गया और हमारी तीनों सेनाओं में समन्वय करा जीत की स्थिति में ले गया। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) मेैं करीब एक लाख सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कराने के बाद प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ शिमला में समझौता किया और सभी युद्ध बंदियों को सकुशल पाकिस्तान भेज दिया। हमारी यह जीत महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि इसी जीत ने इह क्षेत्र में ढाई दशक से ज्यादा समय तक शांति की सौगात दी है। इसी लड़ाई से हमने सबक सीखा है कि शांति के लिए युद्ध जरूरी है। चार युद्धों के बाद हमने अपनी सुरक्षा सेनाओं के महत्व को स्वीकार किया है। इन्हीं का नतीजा है कि हमने अपनी वायुसेना के लिए जगुआर, मिग, मिराज और सखोई विमान प्राप्त किए है। परिवहन के लिए अब डकोटा और पेâअर चाइल्ड के स्थान पर ए.एन-32 और आई एल-76 प्राप्त किए है। वायु सेना की क्षमता में हवा से हवा में, जमीन से जमीन पर और जमीन से हवा में वार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों से वृद्धि हुई है। हम सबक सीख चुके हैं कि अगला युद्ध अगर होगा, तो वह जमीन पर नहीं, आकाश में लड़ा जाएगा। ‘पृथ्वी’ प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण हो चुका है और वायुसेना ७५ प्रक्षेपास्त्रों का आदेश भी दे चुकी है। त्रिशूल प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण भी हुआ है और आकाश का भी। एपेक्स, एपिड, मैजिक, एटोल, एएस 11वीं, ए एस-30 और एस-7 जैसे मारक प्रक्षेपास्त्र हमारे पास है ही। विक्रांत का विकल्प हमारी जल सेना के पास है ही और दूसरे ऐसे जलपोत की पूर्ति की योजना बनाई जा रही है। हमारी थल सेना ज्यादा आधुनिक हथियारों से लैस है और सबके हौंसले ज्यादा बुलंद है।

हम समझ चुके हैं कि लड़ाइयां हथियारों और हौसलों से लड़ी जाती है। बहादुरी और आत्मविश्वास से जीती जाती है और अब हम अपने नेताओं को जीती हुई बाजी हारने का मौका कभी नहीं देंगे। यह भी असम्भव नहीं कि कई इतिहास पुरूषों को भविष्य में देश खलनायक मानने लगे।

प्रकाश हिन्दुस्तानी

दैनिक भास्कर (1998)

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