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‘शाहिद मिर्जा मुहम्मद बेग चुगताई’ (यही तो था उसका पूरा नाम) को खुदा के घर वाया आपरेशन थियेटर पाना मंजूर नहीं था, शायद इसीलिए उसने शार्ट कट चुना। परसों, २७ मई को जन्मदिन पर बधाई का फोन किया तो उसने कहा ‘‘यार तबियत तो ठीक नहीं है, पर ऐसी भी नहीं कि ट्रांसप्लांट कराने की जरूरत पड़े। (भैंरोसिंह) शेखावत जी से बात हुई तो उन्होंने कहा था कि ऐम्स में करा देता हूं, अनुपम (मिश्र) का फोन था कि आ जाओ पर क्या करना..५ जून को नईदुनिया का साठ साल वाला जश्न है, बुलाया है...हो सका तो आऊंगा।’’

और आज शाम को वह आ रहा है। अमेला नहीं, परिवार के साथ। सब होंगे - मां, आरिफ, हाजिक, इमरान, रूखसाना, रेहाना और तमाम रिश्तेदार। फर्वâ होगा तो ये कि वह होगा पर हमेशा बोलते रहने वाला बोलेगा नहीं। सभी धड़कनों के साथ होगा वह।murza

 

शाहिद मि़र्जा की महफिल में बाएं से अतुल पटेल, शाहिद मिर्जा, प्रमोद गणपत्ये, तनवीर फारुकी और अखिलेश वर्मा।

शाहिद के दोस्तों की पेâहरिस्त लम्बी है, नेता, शायर, पैंटर, डांसर, बिजनेसमैन, ढाबेवाले, रिक्शेवाले, मवाली लोग और कुछेक पत्रकार भी। दोस्ती गांठने में उसने कभी मंजूरी नहीं की। पद का ध्यान नहीं रखा। ओहदे, शोहरत या धंधे को तवज्जो नहीं दी। हर रंग का स्वागत। बुद्धिजीवी था, पर कहलाने का शौक नहीं पाला। विशिष्ट था, पर आम बना रहा। पैसा कमा सकता था, पर उससे ज्यादा तवज्जो मोहब्बत को दी। दर्जनों परिवारों में आना जाना था और उसके संबंध घर के सभी लोगों से दोस्ताना होते थे।

शाहिद को कुछ वर्ष पहले तक खाने पीने का शौक रहा। पीना तो कई साल पहले ही (लगभग) छोड़ दिया था, और खाना संतुलित कर दिया था, लेकिन जब जवानी में थे तब कभी एक कचोरी, एक आईस्क्रीम, एक शिवंâजी, या एक आलूबड़ा नहीं मंगवाया। कोई भी चीज बहुवचन में ही आर्डर की। ‘‘भैय्या, तीन शिवंâजी ले आना’’, ‘‘तीन क्यों, हम तो दो है..’’ ‘‘मेरे लिए दो और तुम्हारे लिए भी दो आर्डर करूं क्या?’’

शाहिद, उस दौर का पत्रकार है, जब पत्रकार का मैनेजर होना जरूरी नहीं होता था। वह मैनेजर लायक था भी नहीं। उसने आजीवन अखबार नवीसी की, मैनेजमेंट न तो सीखा, न किया, न करने की कोशिश की। उसने अपने जीवन को भी प्रापरली मैनेज नहीं किया। न वक्त पर घर बनाया, न वक्त पर ब्याह किया, न वक्त पर बाप बना, न वक्त पर दुनियादारी जमाई। उसकी इस गैर जिम्मेदारी को उसने तो खूब एन्जाय किया, बिना यह सोचे कि उसके दोस्तों पर, अपनों पर क्या बीतेगी। यूं चले जाने से अपनों पर क्या बीतेगी, यह तो उसने कभी सोचा नहीं होगा। सोचता तो क्या यूं चला जाता ।

प्रकाश हिन्दुस्तानी

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