कुन्दन सोनी नाम बताया था उसने। मुझे लगा कि वह स्वर्णकार का पुत्र होगा, क्योंकि उपनाम सोनी था और नाम था कुन्दन यानी सोना।
‘‘क्या तुम्हारी सोने-चांदी बेचने की दुकान है?’’ पूछ लिया था यों ही।
‘‘नहीं’ सर, हमारे दादा-परदादा इस बिजनेस में थे। पर पिताजी सर्विस करते हैं। हां, हमारे अंकल लोग अभी भी इसी बिजनेस में है।’’
महसूस किया कि ‘दूकान’ शब्द का इस्तेमाल उसे अच्छा नहीं लगा। इसके बजाय उसने ‘बिजनेस’ शब्द का उपयोग दो बार किया था। मुंह बिचकाने की अदा से यह भी लगा कि वह ‘बिजनेस’ में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखता।
‘‘क्या कर रहे हो आजकल?’’
‘‘आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा हूं।’’
‘‘पहले दी है परीक्षा?’’
‘‘ये तो तीसरी बार है। आखिरी।’’
‘‘विश्वविद्यालय में पोजीशन कौन सी थी।’’
‘‘कोई नहीं।’’
‘‘कालेज में?’’
‘‘कोई नहीं। मैं तो सेंवंâड क्लास हूं, सर।’’
‘‘जब अपने कॉलेज में तुम नम्बर वन नहीं थे तो पूरे भारत में वैâसे ‘नम्बर वन’ आ पाओगे? फिर तुम न तो आरक्षित कोटे के हो, न तुम्हारी कोई ऊंची पहुंच है। फिर भी क्यों वक्त बर्बाद कर रहे हो?’’
‘‘वक्त बर्बाद नहीं कर रहा हूं। मैं अपना लक्ष्य ऊँचां रख रहा हूं, बस ! आज समाज में आपकी पोजीशन इस बात से तय होती है कि आप किस चीज के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं, इससे नहीं कि आप क्या है या वास्तव में क्या पाने के हकदार है?’’
क्या बात कह दी थी उसने। समाज में आपकी पोजीशन इस बात से तय होती है कि आप किस चीज के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं। अर्थात यह महत्वपूर्ण नहीं कि आप क्या है? यह भी नहीं कि आपके आदर्श, लक्ष्य, नैतिकता क्या है? और यह भी नहीं कि आप वास्तव में क्या पाने के हकदार है?
दिमाग में छा गई थी उसकी बात !
बरसों बाद जब अपने कस्बे में गया तो अपने प्रिय चतुर्वेदी सर के घर भी गया। बड़े अच्छे थे वे। पढ़ाते तो घटिया थे, पर विचार बड़े ही सात्विक और महान थे। एन.एस.एस. में उनके साथ शिविरों में भी रहने का मौका आया था। दस-दस दिन तक उनके साथ काम करना, सोना, विचार-विनिमय ! अभिभावक ही हो गए थे कई छात्रों के वे। हर बात में उनकी राय लेते थे और उस पर अमल भी करते थे। उनके बच्चे उम्र में छोटे थे. लेकिन हम समझते थे कि वे हमारे ही भाई बहन हैं।
चतुर्वेदी सर से मिलना प्रीतिकर लगा। वैसे ही नजर आए थे वे। हँसमुख, मिलनसार और अपनत्व से भरे ! हां, उम्र थोड़ी झलकने लगी थी चेहरे पर। घर पर सब सामान्य नजर आता था। मैंने उनसे उनकी बेटी वंदना के बारे में पूछा। उन्होंने जो किस्सा बताया वह अजीब था! उन्होंने बताया -
वंदना की पढ़ाई पूरी हो गई और हमने उसके लिए भोपाल में लड़का देख लिया। लड़का कॉलेज में असिस्टेंट प्रोपेâसर है। शादी की बातें हुई। दोनों को एक दूसरे पसंद थे। दहेज की कोई बात नहीं थी। वंदना की सगाई कर दी गई। पर अब शादी के बारे में ‘सोच’ रहे हैं।
‘सोचने’ का कारण यह नहीं है कि लड़का दहेज मांग रहा है। नहीं ! लड़का बहुत अच्छा है। शराब-सिगरेट नहीं पीता। पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी है। अच्छे खानदान का है। शारीरिक-मानसिक रूप से स्वस्थ है। वंदना भी उसे नापसंद नहीं करती। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें एक और लड़के ने हां कह दी है। उस लड़के से वंदना की शादी के बारे में बातचीत चल रही थी, पर कोई पैâसला हो पाए, इसी बीच भोपाल वाले लड़के से बातचीत हो गई है और उसने हां कह दी। हमने भी हां कर दी। फिर सगाई हो गई।
‘‘फिर दुविधा क्या है?’’
‘‘दुविधा यह है कि दूसरा लड़का ज्यादा अच्छा है। आबकारी विभाग में इंसपेक्टर है। अच्छा कमाता है। सरकारी क्वार्टर है। मां-बाप नहीं है। कोई जिम्मेदारी नहीं है और फिर उसने ‘हां’ भी कह दी है।’’
‘‘क्या दहेज मांग रहा है?’’
‘‘नहीं मांग रहा है। पर मैं तो अपनी बेटी को कुछ दूंगा ही। शादी चाहे जिससे भी करे। इसलिए यह कोई प्राब्लम नहीं है।’’
‘‘देखिए, भोपालवाला लड़का असिस्टेंट प्रोपेâसर है, यानी राजपत्रित अधिकारी। स्वस्थ है। खानदानी है। शालीन है। दहेज भी नहीं मांग रहा है। और उससे सगाई भी कर चुके हैं आप वंदना की। तो फिर अब क्या सोचना?’’
‘‘मेरा नहीं, वंदना का सोचना है। वह कह रही है कि उसने इरादा बदल दिया है और अब वह उस आबकारी विभाग के निरीक्षक से शादी करना चाहती है। वंदना का कहना है कि भोपालवाला लड़का भले ही असिस्टेंट प्रोपेâसर हो, ‘कमाता’ तो दूसरा ज्यादा है। फिर दूसरे के मां-बाप नहीं है, यानी कोई जिम्मेदारी नहीं है। दूसरे वाले को बड़ा सा सरकारी क्वार्टर मिला है जो आरामदेह है, हाउस रेंट भी नाममात्र का ही कटता है। दहेज तो वह भी नहीं मांग रहा है।’’
‘‘पर वंदना की सगाई कर चुके हैं आप।’’
‘‘ये कोई प्राब्लम नहीं है। सगाई ही तो की है, शादी नहीं। सगाई और शादी में अंतर इसीलिए रखा जाता है कि दोनों पक्ष और विचार कर सवेंâ। शादी की तैयारी कर सवेंâ। वंदना के ख्याल खुले हैं। कहती हैं कि पचास-साठ साल की जिन्दगी है आदमी की। २४ घण्टे का दिन। आठ घण्टे आफिस में और आठ सोने में चले जाते हैं। जो कुछ भी लेना-देना है, जीवन जीना है, वह आठ घण्टे में, जो बचते हैं रोज ! फिर वह असिस्टेंट प्रोपेâसर क्या खुशियां देगा? आधी तनख्वाह तो टेक्स, पी.एफ. और हाउस रेंट में ही चली जाती होगी उसकी।’’
‘‘लेकिन जिन्दगी की खुशियों को आप गणित के सवालों की तरह जोड़-घटा नहीं सकते। आदर्शों की भी जगह होती है, जिन्दगी में। वे ही आदमी को आदमी बनाते हैं। आप ही ने सिखाया है यह सब।’’
‘‘मैं अपने विचारों पर कायम हूं। पर वंदना के ऊपर मेैं दबाव नहीं डाल सकता। शादी उसका निजी मामला है। अब अगर मैं दबाव डालकर उसकी शादी भोपाल वाले से कर दूं और अगर आगे अनबन होगी तो मैं दोषी ठहराया जाऊंगा। अगर सगाई तोड़ने के लिए दबाव डालूं तो समाज और आत्मा को गवारा नहीं होगा।’’
कई महीने बीत चुके हैं। अब तक न तो वंदना की शादी हुई है। और न ही सगाई टूटी है। वंदना, उसके पिता यानी चतुर्वेदी सर, भोपाल वाला असिस्टेंट प्रोपेâसर और आबकारी विभाग का इंसपेक्टर। ये तब एक अघोषित अदृष्य यातना को झेल रहे हैं। और लोग भी शामिल होंगे इस यातना में।
क्यों होता है ऐसा? क्या कारण है?
आम बंगाली भद्रलोक के एक सदस्य माने जा सकते हैं शंकर घोष। एक प्राइवेट कम्पनी में डिप्टी मैनेजर है। शादीशुदा है, पत्नी भी एक बैंक में नौकरी करती है। एक छोटा बेटा है। बम्बई के उपनगर मीरा रोड़ में एल.आई.सी. से कर्ज लेकर अपना फ्लैट भी ले लिया है। यानी एक अच्छा खासा मध्यमवर्गीय परिवार कहा जा सकता है। लगता है कि अपनी दाल-रोटी कमा रहा है और चैन से सो रहा है।
एक दिन उन्होंने घर पर आने का न्यौता दिया। मैं रवीन्द्र संगीत सुनने और भारत में वामपंथ की दुर्दशा पर चर्चा करने के मूड में उनके घर चला गया। अच्छा लगा महसूस होने लगा कि खुशियां सचमुच उनके घर में जा बसी है। पति-पत्नी में बेहद लगाव झलका। बच्चा भी प्यारा था। घर करीने से सजा हुआ। एक कोने में सितार औैर तबले थे। लेकिन दो घण्टे तक उनसे जो अंतरंग बातें हुई, उसमें उन्होंने ये ख्याल जाहिर किए -
- मैं यहां पैसा कमाने आया हूं और दिन रात पैसा कमाने के लिए काम कर रहा हूंं। लेकिन इस नौकरी में मेरे काम का कोई मूल्यांकन नहीं। अपने काम से मैं असंतुष्ट हूं, पर क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता।
- पहले मैंने पैसों के लिए खूब काम किया। नौकरी के अलावा पार्ट टाइम भी काम किया, ट्यूशन की। लेकिन निष्कर्ष यह रहा कि मेहनत करके पैसे ज्यादा नहीं कमाए जा सकते। शेयरोंमें पैसा लगाकर अमीर बनना चाहता हूं। पर एक तो पैसे ज्यादा नहीं है, दूसरे मार्वेâट मंदा है।
- पूरा जमाना दिखावे का है। हम लोग कर्ज ले लेकर अपना स्टेटस बनाए हुए हैं। भीतरी हालत खराब ही है। मकान के कर्ज की किस्त, वी.सी.आर. की किस्त, आवास सोसायटी की फीस, बिजली बिल, नौकर, व्रेâश, रेलवे का पास, टैक्सी-ऑटो-बस का भाड़ा, बालवाड़ी और स्वूâल की फीस, केबल टीवी का शुल्क आदि-आदि देकर इतना भी नहीं बचता कि वीवेंâड में कहीं पिकनिक पर जा सवेंâ, किसी बढ़िया चायनीज रेस्तांरां में बैठकर खाना खा सवेंâ।
बड़ा ही विचित्र अनुभव रहा। मैं मिलने गया था बंगाली भद्र लोक के एक नागरिक से पर मुलाकात किससे हुई? एक नागरिक जो अपनी योग्यतानुसार लगभग सभी आवश्यक भौतिक वस्तुएं प्राप्त कर चुका है, उसे अब भी संतोष नहीं है। येन केन प्रकारेण वह और भौतिक चीजें पाना चाहता है। इस समाज के प्रति, देश के प्रति, मानवता के प्रति कोई कत्र्तव्य नहीं समझता। समाज के आर्थिक रूप से दरिद्र वर्ग के लोगों की तरह उसमें कोई वर्ग चेतना नहीं हे या वह उसे प्रकट नहीं करना चाहता। वह शोषित नहीं है। लेकिन वह है आत्मकेन्द्रित व्यक्ति या वर्ग।
समाज शास्त्र की किताबों में समाज के वर्गों की व्याख्या स्पष्ट लिखी है। लेकिन बड़ा ही अलग होता जा रहा है। भारतीय मधमय वर्ग। रोजमर्रा में हम उस वर्ग के विरोधाभास को देखते और झेलते हैं। आप सिर्पâ आय के आधार पर सामाजिक वर्गों को नहीं बांट सकते। मध्यम वर्ग में भी नए-नए वर्ग तेजी से फल-पूâल रहे हैं। शहरी मध्यम वर्ग, कस्बाई मध्यम वर्ग, ग्रामीण मध्यम वर्ग, शहरी सपेâद पोश मध्यम वर्ग, शहरी नवजात मध्यम वर्ग, शहरी नवधनाढ्यो में बदलने की प्रक्रिया में शामिल मध्यम वर्ग, व्यवस्था का लाभ उठाने वाला संगठित शहरी मध्यम वर्ग, व्यवस्था का दलाल मध्यम वर्ग आदि-आदि।
इस भारतीय मध्यमवर्ग की खूबी यह है कि यह नीतियां निर्धारित नहीं करता, लेकिन नीतियों को प्रभावित करने की सारी शक्ति इस वर्ग के पास है। कारण यह है कि नीतियों को कार्यान्वित करने का उपकरण यही वर्ग है। संचार माध्यमों पर इस वर्ग को कब्जा अप्रत्यक्ष रूप से है। निम्न वर्ग के पास सिर्पâ वोट देने की शक्ति है तो इस वर्ग के पास निम्न वर्ग के विचारों को प्रभावित करने का माद्दा है। विश्वनाथप्रताप सिंह की सरकार ने जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की तब सबसे ज्यादा आहत यही वर्ग हुआ। प्रचार के माध्यमों के जरिए इसी वर्ग ने सबसे ज्यादा शोर मचाया। अखबारों और रिसालों के सबसे ज्यादा खरीददार और पाठक यही मध्यम वर्ग के लोग हैं। अखबारों व पत्रिकाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए मंडल को लेकर विचारोंत्तेजक लेख और रिपोर्ट छापने लगी। अखबारों के मालिकों को इसमें लाभ नजर आया क्योंकि इस विवाद से उनके प्रसार में वृद्धि हो रही थी, और इससे उसका हित जुड़ा था। मंडल आयोग के विरोध की छोटी सी खबर भी उनके लिए कन्ज्यूमर आइटम थी, और मध्यमवर्ग था कन्ज्यूमर। नतीजा यह रहा कि मंडल आयोग की सिफारिशें पूरी तरह लागू होने में अड़चनें ही अड़चनें नजर आने लगी।
राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद वाला मामला भी देखिए। किसकी रूचि है इसमें? मध्यमवर्ग के ही एक खास वर्ग की। भारतीय जनता पार्टी मूलत: मध्यमवर्गीय लोगों की ही पार्टी है और लगातार कोशिशें की जा रही है कि समाज के दूसरे वर्गों को भी इस विवाद में घसीट लिया जाए। पर यह सम्भव नहीं हो पा रहा है। भारतीय मध्यम वर्ग की बौद्धिक चिंताओं में अयोध्या का विवाद एक मुख्य समस्या है। विचित्र बात यह है कि करोड़ों भारतीयों को पौष्टिक खाना नहीं मिल रहा है, पीने का पानी अनुपलब्ध है, चिकित्सा की सुविधाएं नहीं है, बच्चों के पैरों में जूते नहीं है, करोड़ों घरों की कमी है, जमीन की सिंचाई के लिए पानी नहीं है, बेरोजगारी है, दहेज की संभावनाएं है, लेकिन इस वर्ग को यह सब नजर नहीं आ रहा। अयोध्या और मंडल उसकी समस्याएं है, दूरदर्शन के कार्यक्रम उसकी समस्या है, इंडियन एअरलाइन्स की परिचारिकाओं का बर्तन उसकी समस्या है, डायना और प्रिंस चाल्र्स में तलाक होना या न होना उसकी समस्या है। यानी भारतीय मध्यमवर्ग को, खासकर पढ़े-लिखे शहरी सपेâदपोश मध्यमवर्ग को हर उस चीज में रूचि है जो उसे गुदगुदाती है। समस्याएं पैâले नहीं, इसमें उसकी रूचि नहीं। मूल समस्याओं के बारे में वह सोचता नहीं। सौ फीसदी आत्मकेन्द्रित यह वर्ग हर किसी से शिकायत करता है। उसे अपने शोषण की शिकायत है, लेकिन वह खुलकर विरोध नहीं करता। वह समाज के निम्नतम वर्ग से अच्छा है, लेकिन वह अपने आपको सुविधा भोगी नहीं कह सकता। उच्च वर्ग को मिले लाभों से वह हमेशा चिढ़ता है, लेकिन रहता इसी तिकड़म में है कि कब और वैâसे फायदा उठा ले।
दुर्भाग्य से इसी पढ़े-लिखे शहरी सपेâदपोश मध्यमवर्ग के पास सारी शक्ति केन्द्रित है। भले ही वह दो हजार महीना कमाता हो या दस हजार। आज वह वर्ग उपभोक्ता वस्तुओं का सबसे बड़ा खरीददार हो गया है। इस वर्ग में विधि व्यवसाय, शिक्षा, प्रशासन, वित्तीय संगठन से जुड़े लोग तो शामिल है ही, छोटे व्यवसायी, जमींदार और व्यवस्था से लाभान्वित होकर ऊँचे उठे, पिछले वर्ग के सभी संगठित कर्मचारी भी शामिल है। चूंकि यही वर्ग है जो तेजी से एक नए उपभोक्ता वर्ग में तब्दील हो रहा है इसलिए सारे विज्ञापन इन्हीं लोगों पर केन्द्रित हैं। पत्रिकाएं ये लोग पढ़ते हैं इसलिए विज्ञापनदाता इस वर्ग की ओर आकर्षित होते हैं। दूरदर्शन के विज्ञापनों को देखकर ये ही लोग वस्तुएं खरीदते हैं, इसलिए उसका ध्यान भी इसी वर्ग को खुश करने के कार्यक्रमों में रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में जर्बदस्त क्रांति लाने की ताकत रखनेवाला दूरदर्शन मध्यमवर्गीय घरों में टाइमपास करने की मशीन बनकर रह गया है। विचित्र त्रासदी यह है कि अब इन मध्यमवर्गीय घरों में कोई बच्चा रवीन्द्रनाथ टैगोर या प्रेमचंद बनने की नहीं सोचता। बाबा आमटे से उसे प्रेरणा नहीं मिलती। ध्यानचंद की तरह वह खिलाड़ी नहीं बनना चाहता। न ही वह जगदीश चन्द्र बसु की तरह बनना चाहता है। कला, साहित्य, विज्ञान, खेल या समाज सेवा इस वर्ग के लिए अब आकर्षण का केन्द्र अगर है, तो सिर्पâ इसलिए कि यह अच्छा ‘वैâरियर’ हो सकती है। और यही बात बच्चों को सिखाई जा रही है। खेल खेलो और पुरस्कार जीतो। खेल भावना की क्या जरूरत? समाज सेवा करो और पुरस्कार पाओ। पढ़ो इसलिए कि अच्छी नौकरी लग जाए और ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा सको। ज्ञान की कोई जरूरत नहीं है।
राजा राममोहनराय का साथ देने वाला मध्यम वर्ग आज कहां है? वह मध्यमवर्ग कहां है जिसे लोकमान्य तिलक और सुभाषचन्द्र बोस जैसों ने संगठित किया था? आदर्शों के लिए जी जान लगा देने वाला, देश के लिए बलिदान होने वाला, समाज सेवा में जीवन पूंâक देने वाला मध्यम वर्ग आज लापता हो गया है। बौद्धिक विवादों में अब इस वर्ग की रूचि नहीं है।
इस भारतीय सपेâद पोश मध्यमवर्ग की कई दिलचस्प बातों को हम इस तरह रेखांकित कर सकते हैं।
एक ऐसा वर्ग जो सुविधा तो भोग रहा है, लेकिन और ज्यादा सुविधाओं की तीव्र आवश्यकता उसे ही है।
जो अपने विचारों को अपने लाभ के लिए बदल सकता है और तर्वâ जुटा सकता है कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वही सबके लिए सही है।
व्यवस्था की निंदा करना इस वर्ग का प्रिय शगल है। लेकिन व्यवस्था में बदलाव की बात चले तो बाधक भी यही वर्ग है।
पाखण्ड का प्रेमी ! ‘सा रे गा मा प’ का ‘सा’ भी न समझने वाला, मगर संगीत की महफिलों में भीड़ बढ़ाने वाला। कला से अरूचि रखने वाला, लेकिन कला को सर्वश्रेष्ठ दिखाने वाला।
येन-केन-प्रकारेण अपने लिए सुविधाएं जुटाने वाला वर्ग, जो उन्हें बांटना नहीं चाहता।
दिखावे में यकीन करने वाला। कहने वाला कुछ, पर करने वाला कुछ और । बातों से दहेज का विरोधी, लेकिन दहेज लेने वाला।
राष्ट्रभाषाका हिमायती, लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्वूâलों में भेजने वाला।
क्रांति की बातें करने वाला और खतरों से भागने वाला डरपोक।
और अंत में, सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह मध्यमवर्ग अपनी स्थिति खूब अच्छी तरह समझता है, पर वह उसे मौका आने पर ही प्रकट करता है। क्यों है वह ऐसा?
प्रकाश हिन्दुस्तानी
नवभारत टाइम्स