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यह जानना दिलचस्प है कि देवआनंद कभी पोस्ट ऑफिस में काम करते थे, सुनील दत्त ‘बेस्ट’ में हिसाब किताब रखते थे, सुशील कुमार शिंदे कोर्ट में अर्दली और पुलिस सब इंसपेक्टर थे, अनिल धारकर इंजीनियर थे, रजनीकांत औैर हसरत जयपुरी बस वंâडक्टर थे, गुलशन कुमार ज्यूस बेचा करते थे, प्रेम चोपड़ा टाइम्स ऑफ इंडिया के विज्ञापन विभाग में काम करते थे, जॉनी लिवर हिन्दुस्तान लीवर कम्पनी में मजदूर थे, दादा कोंडके शादी-ब्याह में बाजा बजाया करते थे...एक लम्बी पेâहरिस्त है इसकी। यहां प्रकाश हिन्सुतानी प्रस्तुत कर रहे हैं कुछ ऐसी ही विलक्षण प्रतिभाओं के बारे में जो में मिथक बन गये हैं।

बंगलूर में बस वंâडक्टरी करते हुए रजनीकांत (पूरा नाम शिवाजी राव गायकवाड़) ने कभी सोचा नहीं था असली जीवन में वे कभी इतने बड़े सुपरस्टार बन जायेंगे। वे इसे कुछ तो तकदीर का तमाशा मानते हैं, कुछ मेहनत का सुफल।

 

रजनीकांत की पढ़ाई-लिखाई रामकृष्ण आश्रय की शिक्षण संस्थाओं में हुई और फिर वे बंगलूर में बस वंâडक्टर हो गये। स्टाइल मारने के आदी तो वे तब भी थे ही। झटके से विकट फाड़कर देते थे और अदा से चिल्लर गिनते थे। सिगरेट सुलगाने की उनकी अनोखी अदा के बस यात्री दीवाने थे।

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बहरहाल नाटक करने का शौक उन्हें था और एक नाटक में उनकी दुर्योधन की भूमिका बहुत सराही गयी। दोस्तों की राय पर बंगलूर की बस वंâडक्टरी छोड़कर मद्रास चले गये अभिनय का प्रशिक्षण लेने। परदे पर एक्टिंग का मौका उन्हें ‘अपूर्व रांगागल’ फिल्म में मिला। विख्यात निर्माता-निर्देशक बालचंदर ने उन्हें ‘मुन्दु मुदीचू’ फिल्म में एंटी हीरो के रूप में लिया। ‘भैरवी’ फिल्म में हीरो बने जो सुपरहिट रही। ‘अंधा कानून’ उनकी पहली हिन्दी फिल्म थी। इसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

रजनीकांत को अपनी ‘मार्वेâटिंग’ करना अच्छा आता है। कहा जाता है कि ‘दलपति’ फिल्म में अभिनय के लिए उन्होंने डेढ़ करोड़ रूपये लिये थे। वे बड़े बजट की हिन्दी फिल्मों में ही काम करना पसन्द करते हैं और उसमें भी ऐसी फिल्में, जिनमें बहुत से बड़े स्टार हों। इससे उन्हें यह फायदा होता है कि फिल्म की कामयाबी सिर्पâ उनके वंâधे पर नहीं होती।

रजनीकांत में एन.टी.आर. या अमिताभ जैसी बौद्धिक प्रतिभा नहीं है। लेकिन लोकप्रियता में वे इनसे कम नहीं। रजनीकांत का साफ-साफ मानना है कि फिल्म एक उद्योग है और इसमें सब लोग पैसा कमाने आते है। सरकार भी इस मुनापेâ में से अपना हिस्सा टैक्स के रूप में लेती है। पर वे यह भी कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि अभिनय ही मेरे लिए सब कुछ है। देव आनंद की तरह उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं कि परदे पर उन्हें देखकर दर्शक क्या सोचते हैं।

रजनीकांत ने एक अंग्रेजी फिल्म में भी काम किया है। पर तमिल में उनकी लोकप्रियता का जवाब नहीं। एक किस्सा है कि जब एक बार उनकी अपनी पत्नी से अनबन हो गयी और रजनीकांत एक होटल में जाकर रहने लगे। इससे उनके प्रशंसक बहुत दुखी हुए और वे हजारों की संख्या में उनके घर के सामने जाकर तब तक धरना देकर बैठे रहे, जब तक कि वे वापस घर नहीं लौट गये।

हर्षद मेहता घरेलू लाइब्रेरी चलाते थे

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शेयर बाजार के भूतपूर्व खलीफा हर्षद मेहता अब कहां है? पिछले साल तो वे इन दिनों चरम पर थे, तब किसी को पता नहीं था कि वे अब इस शिखर से किस शिखर पर जायेंगे। अब, जबकि वे हाशिये पर हैं, उनके बारे में जिक्र करना भी अजीब लगता है। कोई आदमी जीते जी किस तरह किस्सा-कहानी हो जाता है, वे इसी का नमूना है।

हर्षद मेहता के बारे में पिछले साल के शुरू में जो बातें छपी थी, उनसे कुछ ऐसा माहौल बना था, जैसे वे कोई देवता, सुपर ह्यूमन हों। देश भर में लाखों लोग उनके जैसे आदमी बनने का सपना देखने लगे थे। दिलचस्प बात यह है कि ११० दिन जेल मेैं रहने के बाद भी कई लोग उनमें विश्वास व्यक्त करते हैं और मानते हैं कि कामयाब होने के लिए कुछ न कुछ गैर कानूनी काम करना अनिवार्य है।

लोग मानते हैं कि आज की दुनिया में जिसे कामयाबी कहा जाता है, उसे पाने के लिए कोई विशेष योग्यता तो आदमी में होनी ही चाहिए, इसके साथ ही पर्याप्त तिकड़मी और खतरा उठाने की जोखिम भी होना जरूरी है। हर्षद मेहता में यह सब ‘गुण’ थे।

अंजाम एक अलग मुद्दा है। लेकिन हर्षद मेहता ने जो कुछ किया, कामयाबी से किया। डंके की चोट पर।

हर्षद के पिता बम्बई में कपड़े के व्यापारी थे। वे बीमार हुए तो रायपुर चले गये। घर की माली हालत सुधारने के लिए हर्षद और उनके भाई अश्विन ने बच्चों के लिए लाइब्रेरी चलायी। हीरे छांटने का धंधा किया। सीमेंट और होजियरी बेची और अंत में बम्बई आकर न्यू इंडिया एश्योरेंस कम्पनी में ४५० रूपये महीने की नौकरी कर ली।

३६ प्रतशित अंक पाकर बी.कॉम. पास करने वाले हर्षद मेहता के जीवन में दो मोड़ बड़े ही महत्वपूर्ण थे। उन्हें अपनी कम्पनी में निवेश प्रकोष्ठ में काम करने का मौका मिला और तभी उन्हें किसी से प्यार हो गया। हालत यह थी कि अपनी प्रेमिका को हर्षद ने जो पहली भेंट दी थी - वह भी उधार के पैसों से खरीदा गया पेन था। लेकिन तभी उन्हें पैसा कमाने का जुनून हुआ और वे नौकरी छोड़कर शेयरों के धंधे में घुस गये। वे जो भी करते रहे हैं, उस बारे में इतना कुछ प्रकाशित-प्रचारित हो चुका है कि कुछ ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं। हां, उनका शेयर का दैनिक कारोबार २५०० करोड़ रूपये तक हो गया था। हर्षद मेहता का चरित्र चाहे जो हो, उनको चाहने वाले भी लाखों है और बरसों-बरस वे चर्चा में रहेंगे ही।

पोस्ट आफिस में कर्मचारी- देव आनंद

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बम्बई में देव आनंद ने १९ जुलाई १९४४ को कदम रखा था। तब उनकी उम्र इक्कीस साल थी। उनके पास बी.ए. ऑनर्स की डिग्री थी और मन में कुछ करने का संकल्प। परेल की एक चाल में वे अपने दोस्त के साथ रहने लगे थे और अपने गुजारे के लिए १६५ रूपये प्रतिमाह की सैनिक डाक सेवा की नौकरी कर ली। वह दौर विश्वभर में उथल-पुथल का था और भारत में अंग्रेजों का राज था। देव आनंद का मुख्य काम था भारतीय सैनिकोें की चिट्ठियों को खोलकर पढ़ना, सेंसर करना और संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाना।

अपनी लाइन बदलने में देव आनंद को सुविधा यह रही कि उनके भाई चेतन आनंद पहले से ही बम्बई में थे और ‘इप्टा’ के नाटकों के अलावा ख्वाजा अहमद अब्बास से जुड़े थे। कुछ दिनों बाद देव आनंद ने पुणे में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक है’ के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया। और उसमें पास हो गये। लौटकर वापस बम्बई आये तब खुशी और उत्तेजना के मारे तेज बुखार हो गया था उन्हें। ‘हम एक हैं’ के सेट पर सबसे पहले जब वे गये, तब धोती पहने हुए थे। किसे पता था कि धोती पहनने वाला यह नौजवान एक दिन लाखों नौजवानों की टाई, बेल्ट और टोपी के डिजाइन-पैâशन का पैâसला करेगा। ‘हम एक हैं’ के हीरो देवआनंद प्रभात स्टूडियो में चार सौ रूपये महीने के कर्मचारी थे।

परदे पर देव आनंद ने सदा अपनी इमेज का ख्याल रखा। नखरे उनके भी थे। ‘आंधियां’ फिल्म के सेट पर उन्हें एक दृश्य में अख्तर हुसेन से थप्पड़ खाना था। यही कहानी थी। पर देव आनंद अड़ गये। बोले ‘मैं हीरो हूं’ थप्पड़ खाने का तो सवाल ही नहीं उठता। क्या मेरे दो हाथ नहीं है। फिल्म के दर्शक क्या सोचेंगे। यह फिल्म की मांग होगी, पर यह मेरी भी वैâरियर का सवाल है।’

हीरो बनने के चार साल बाद ही देव आनंद ने फिल्म निर्माण में कदम रखा। १९४९ में सुरैया को नायिका के रूप में लेकर उन्होंने ‘अफसर’ बनाई। वे ‘जीत’ और ‘सनम’ में भी सुरैया के हीरो थे। और यह माना जाता था कि दोनों शादी कर लेंगे। पर इन दोनों की शादी नहीं हो सकी। १९५१ में ‘सनम’ रिलीज हुई और यह जोड़ी टूट गयी। असली जीवन में उन्होंने कल्पना कार्तिक से जोड़ी मिलायी।

कई-कई हिट फिल्मों के निर्माता-निर्देशक हीरो देव आनंद अभी सत्तरवें साल में है। तीन पीढ़ियों के हीरो है। वे एकमात्र हीरो है जो दादी-नानी के भी सपनों में आते हैं और नाती-पोती के भी।

पेट्रोल पंप पर सहायक- धीरूभाई अम्बानी

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धीरूभाई अम्बानी देश के सबसे बड़े उद्योगपति नहीं है, लेकिन उन्हें सबसे प्रभावशाली उद्योगपति माना जाता है। टाटा और बिड़ला का औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करने मेैं कई कई पीढ़ियां खप गयी, लेकिन इस गुजराती व्यवसायी ने अकेले अपने दम पर साम्राज्य खड़ा किया। इससे बढ़कर उन्हें भारतीय पूंजी बाजार को एक नया मोड़ देने का श्रेय जाता है।

 

एक गुजराती कहावत है, जिसका अर्थ होता है ‘‘अम्बानी गांव के पैसे से मजा कर रहे हैं’’ और यह बात शायद सच भी है। अगर उसके कम्पनी समूह की तमाम लेनदारियों और देनदारियों की तुलना करें तो इसे साबित भी किया जा सकता है। क्या चमत्कार है इस आदमी में। एक स्वूâल मास्टर का बेटा। जिसने एदन में पैट्रोल पम्प पर नौकरी की और भारत लोटकर रिलायंस टैक्सटाइल कम्पनी बनायी। दस साल में ही वह कम्पनी देश की शिखर कम्पनियों में पहुंच गयी। इस आदमी की कम्पनी के एक विज्ञापन के जवाब में लाखों लोग अपने खून-पसीने की कमाई लेकर शेयर खरीदने पहुंच जाते थे और मील मील भर लम्बी लाइन में लगकर पैसा देने को आतुर रहते थे।

१९३४ में जन्मे धीरूभाई जवानी में एदन चले गये और वहां एक पैट्रोल पम्प पर नौकरी कर ली। वहां से कुछ रूपया जोड़कर भारत लौटे और यहां आकर यार्न का धंधा शुरू कर दिया। ३२ साल की उम्र में ‘रिलायंस’ नामक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी शुरू की। तीन साल बाद कम्पनी ने कपड़े का उत्पादन शुरू किया। १९७७ में रिलायंस पब्लिक लिमिटेड कम्पनी में तब्दील हुई। और फिर रिलायंस और अंबानी लगातार सूर्खियों में ही बने रहे।

कई लोग कहते हैं कि अम्बानी उद्योेगपति नहीं, राजनीतिज्ञ है। उन्होंने जनता दल की सरकार के दौर में इंदिरा गांधी का साथ दिया। आर. के. धवन और प्रणव मुखर्जी को उन्होंने पटाकर रखा। अखबारवालों को पटाया और कुछ से दुश्मनी मोल ली। नौकरशाहों को खरीदा। अनिवासी भारतीयों की पूंजी का दुरूपयोग किया। शेयर बाजार में गड़बड़ियां की। दूसरी कम्पनियों को टेकओवर किया। बाम्बे डाइंग से उनकी प्रतिस्पर्धा निचले स्तर तक गयी। उन्होंने अपनी कम्पनियों का विस्तार बड़े ही साम्राज्यवादी तरीके से किया। उन्हें बीसीसीआई के घोटाले से भी जोड़ा गया। विचित्र बात यह थी कि एक दौर ऐसा आया था, जबकि देश में होनेवाली किसी भी घटना के पीछे अम्बानी का हाथ माना जाता था। कुछ भी हुआ तो अम्बानी ने कराया। नहीं हुआ तो अम्बानी नहीं चाहते थे। अनुमान है कि उनके पास विनियजकों का करीब चार हजार करोड़ रूपया जमा है।

अब उनका कम्पनी समूह कपड़ा ही नहीं बनाता, पोलिएस्टर, फिलामेंटयार्न, पी.टी.ए., एम.ई.जी., पोलीविनाइल क्लोराइड, पोलिथिलीन, पोलिप्रापलिन, आधारभूत पेट्रोकेमिकल्स और तेल शोधन के क्षेत्र में भी कार्यरत है। वे अपने प्रकाशन समूह और वित्तीय कम्पनियां चलाते हैं, रिलायंस यूरोप के नाम से अन्तरराष्ट्रीय व्यापार करते हैं। उनके कामों को जाहिर करना हो तो कई ग्रंथ भी कम पड़ेंगे।

नव भारत टाइम्स

 

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