
बजट है या अंधों का हाथी? कैसा है ये बजट? मध्यवर्गीय की नज़र में -- जेब काटने और महंगाई बढाने वाला !उद्योगपतियों की नज़र में -- निवेश और रोजगार बढ़ानेवाला। बीपीएल के लिए -- आशाजनक ! सत्तासीनों की निगाह में --ऐतिहासिक और विपक्ष की नजर में -- होपलेस ! जिस तरह रेल बजट में आशा के विपरीत कोई नयी रेल चलाने का ऐलान नहीं था, आम बजट में भी आशा के अनुरूप कोई नयी छूट टैक्स में नहीं मिली।
अरुण जेटली ने वित्त मंत्री के रूप में सपने खूब दिखाए। सस्ता क्या हुआ? सभी कुछ महंगा। कुछ छोड़ा क्या? रेस्टोरेंट में खाना,कम्प्यूटर, लैपटॉप , मोबाइल, फोन, दवाइयां ,घर ,पान मसाला, गुटखा , सिगरेट, केबल टीवी, वाई फाई , हवाई यात्रा, ब्यूटी पार्लर, इंश्योरेंस पॉलिसी, फोन और मोबाइल के बिल, ट्रैवलिंग, ड्राईक्लीनिंग, जिम, होटल में ठहरना, सभी तो महंगा हुआ है. सर्विस टैक्स में बढ़ोतरी से तकरीबन हर चीज महंगी ही होगी। और सस्ता क्या होगा? एक हजार रुपये से ज्यादा के चमड़े के जूते, हाइब्रिड और बिजली से चलने वाली गाडियां , एलईडी औरएलसीडी टीवी, अगरबत्ती, एलईडी लाइट और एलईडी लैंप, सोलर वॉटर हीटर, पेसमेकर, एंबुलेंस व एंबुलेंस सेवाएं, अगरबत्ती, माइक्रोवेव अवन, रेफ्रिजरेटर कम्प्रेसर, मूंगफली का मक्खन, पैकेटबंद फल व सब्जियां, संग्रहालय, चिड़ियाघर व राष्ट्रीय पार्क की यात्रा। बताइए आप ही, बचत ज्यादा होगी या जेबें ज्यादा हल्की होंगी?
जो लोग यह समझते हैं कि बजट चीज़ों या सेवाओं को सस्ता या महंगा घोषित करने का सरकारी त्यौहार है , वे गलत हैं। बजट, अर्थ व्यवस्था को दिशा देने की प्रक्रिया है और रेल बजट और आम बजट दोनों में ही इस बात पर ध्यान रखा गया है कि देश की आर्थिक सेहत कैसे सुधारी जाए। इस बजट की एक और खूबी यह है कि इसमें पूरे देश के साथ सामान बर्ताव झलकता है। 2014 -15 की तुलना में 2015 -16 में हाइवे, नेशनल हेल्थ मिशन, सर्वशिक्षा अभियान मिड डे मील पर काम खर्च होनेवाला है।
यह बजट काला धन रखनेवालों के भी बुरे ख़्वाब लेकर आया है. काला धन नहीं बढ़े और टैक्स चोरों में दहशत हो, इसकी कोशिश अच्छी है। देश की आर्थिक बुनियाद अच्छी हो तो इसके लिए अपने कुछ सुख छोड़ने पड़ेंगे। हम देश की अर्थ व्यवस्था में तो सुधार चाहते हैं, लेकिन लिए कोई त्याग नहीं करना चाहते. 'न्यूनतम सरकार - अधिकतम शासन' , 'मेक इन इंडिया' , ' अच्छे दिन' 'जन धन योजना', 'कोयला ब्लॉक नीलामी' और 'स्वच्छ भारत अभियान' की खातिर सरकार ने खतरा उठाया है. देखते हैं कि ये सब भी खालिस 'जुमले' तो नहीं? आशा कर सकते हैं कि जेटली जी के भाषण में जो शेर कहा गया था उसमें फूल का अर्थ पुष्प ही होगा, अंग्रेज़ी वाला फूल नहीं.
-प्रकाश हिन्दुस्तानी