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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कद आसमान जैसा था, लेकिन उनके पैर हमेशा जमीन पर रहते थे। इसीलिए वे इतने बड़े व्यक्ति माने जाते है। राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे हमेशा सामान्य लोगों की तरह ही बर्ताव करते रहे और राष्ट्रपति पद से निवृत्त होने के बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा के लिए समर्पित रहे। उन्होंने इतने उल्लेखनीय कार्य किए कि उनकी हर बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह नजर आती है। रामेश्वरम के एक छोटे से गांव से सफर शुरू करने वाले डॉ. कलाम ने अहंकार को कभी अपने नजदीक नहीं आने दिया। इनोवेटिव तरीके से वे सेवा के नए-नए आयाम खोजते रहे। विद्यार्थियों को प्रेरणा देते रहे और भारत में बदलाव के प्रमुख आर्किटेक्ट बने। यह बात उन पर बिलकुल सही बैठती है कि बड़े आदमी बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते, बड़े आदमी छोटी-छोटी बातें भी करते है और छोटी बातों का ध्यान रखते है। उनके दर्जनों किस्से है, जो बताते है कि वे किस मिट्टी के बने थे और उनकी आत्मा किन गहराइयों तक पहुंच रखती थी।

डॉ. कलाम सर्वधर्म सम्भाव में यकीन करते थे। वे खुद को आस्तिक बताने से संकोच करते थे, लेकिन सभी धर्मों का सम्मान उनके मन में होता था। डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए राष्ट्रपति भवन में सरकारी खर्चे से होने वाली इफ्तार पार्टियां बंद करवा दी थी (उनके बाद ऐसी पार्टियां फिर शुरू हो गई)। यह डॉ. कलाम के व्यक्तित्व की विशालता थी कि किसी ने भी इफ्तार पार्टियां बंद किए जाने पर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। जब डॉ. कलाम राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए जाने वाले थे, उसके एक दिन पहले प्रमोद महाजन उनसे मिलने गए और उनसे पूछा कि नामांकन पत्र दाखिल करने का कौन-सा मुहूर्त उन्होंने चुना है? डॉ. कलाम ने कहा कि इस ब्रह्मांड में जब तक तारे और सूर्य सलामत है, जब तक दिन और रात है, तब तक हर घड़ी शुभ मुहूर्त है।

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डॉ. कलाम बच्चों में खासे लोकप्रिय थे। वे हमेशा विद्यार्थियों को आगे बढ़ने और मेहनत करने की सलाह देते थे। उन्होंने खुद अपने जीवन में अनेक तरह के संघर्ष किए, अनेक परीक्षाएं पास की, कहीं-कहीं उन्हें मनचाही सफलता नहीं भी मिली, लेकिन वे लगातार अपने कार्य में जुटे रहे। राष्ट्रपति बनने के बाद भी राष्ट्रपति भवन में स्कूलों के विद्यार्थी उनसे मिलने आते थे। एक बार एक विद्यार्थी ने इच्छा व्यक्त की कि वे राष्ट्रपतिजी का कैबिन देखना चाहता है। डॉ. कलाम उस बच्चे को न केवल अपने कैबिन में ले गए, बल्कि उसकी सारी बातें ध्यान से सुनी और उसके साथ फोटो भी खिंचवाया। शायद ही कोई ऐसा राष्ट्रपति होगा जिसके साथ आम लोगों के इतने ज्यादा फोटोग्राफ्स हो। सोशल मीडिया पर डॉ. कलाम को दी जाने वाली श्रद्धांजलियों को देखकर यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि वे आम लोगों से कितने नजदीक थे। साधारण से साधारण व्यक्ति से भी मिलने में उन्हें कभी संकोच नहीं होता था। उनकी बातें ‘अनमोल वचन’ की तरह लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर अंकित है। उनकी किताबें बेस्ट सेलर किताबें है। उनकी कविताएं दर्जनों भाषाओं में अनुवाद होकर प्रकाशित हो चुकी है।

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एक बार डॉ. कलाम के कार्यालय भवन की बाहरी दीवार पर ऊपरी हिस्से में कांच के टूटे हुए टुकड़े लगाए जा रहे थे, ताकि कोई व्यक्ति दीवार फांदकर अंदर आने की कोशिश न करें। डॉ. कलाम ने उस कार्य को तत्काल रुकवा दिया। उन्होंने कहा कि कांच के टुकड़े लगाने से हो सकता है कि अनधिकृत प्रवेश करने वाला आदमी रुक जाए, लेकिन उन पंछियों का क्या होगा, जो दीवार पर बैठकर सुस्ताते है।

एक और किस्सा है। डॉ. कलाम की उम्मीदवारी को राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित किया जा चुका था और उन्हें एक स्कूल में भाषण देने जाना था। भावी राष्ट्रपति के रूप में उनकी सुरक्षा के तगड़े इंतजाम किए जा रहे थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा कि न्यूनतम सुरक्षाकर्मी ही बच्चों के कार्यक्रम में मौजूद रहे। जब विद्यालय में कार्यक्रम चल रहा था तब अचानक बिजली गुल हो गई। कलाम साहब अपनी कुर्सी से उठे और उन्होंने सभी बच्चों को संबोधित करते हुए स्थिति संभाल ली।

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राष्ट्रपति के रूप में मिलने वाली पूरी तनख्वाह और अपनी तमाम बचत उन्होंने एक ट्रस्ट को दान दे दी थी। जिसका नाम प्रोवाइडिंग अरबन एमेनिटीज टु रूरल इंडिया। इस संस्था का उद्देश्य गांव में वैसी ही सुविधाएं मुहैया कराना था जैसी की शहरों में होती है। संस्था को अपनी तमाम बचत और वेतन समर्पित करते हुए डॉ. कलाम ने कहा था कि अब तो मैं राष्ट्रपति बन गया हूं, तो इस सब बचत और तनख्वाह का करूंगा क्या?

एक बार डॉ. कलाम राष्ट्रपति के रूप में केरल की यात्रा पर गए। प्रोटोकोल के अनुसार उन्हें केरल के राज्यपाल के राजनिवास स्थित विशेष अतिथि गृह में ठहराया गया। उस अतिथि गृह में उन्होंने अनेक लोगों से मुलाकात की। इस मुलाकात में ऐसे सामान्य किन्तु विशेष लोग थे, जिनके बारे में राजभवन के अधिकारियों ने सोचा नहीं था। इनमें से एक थे फुटपाथ पर बैठकर जूते पॉलिश करने वाले और दूसरे थे एक छोटे से रेस्टोरेंट के मालिक। आमतौर पर ऐसे लोग राजभवन में कभी घुस भी नहीं पाते, लेकिन वे न केवल राजभवन में गए बल्कि वहां के अतिविशष्ट राष्ट्रपति विश्राम गृह में जाकर राष्ट्रपति से भी मिले। ये दोनों लोग राष्ट्रपति जी को निजी तौर पर जानते थे। डॉ. कलाम जब केरल में थे, तब कई बार उस रेस्टोरेंट का भोजन मंगवाया करते थे।

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डॉ. कलाम कभी भी किसी भी कार्यक्रम में देरी से नहीं पहुंचते थे। उनकी कोशिश होती थी कि कार्यक्रम के कुछ समय पहले पहुंचकर लोगों से मिला जाए। इंदौर के आईआईएम में एक कार्यक्रम में वे समय के पहले पहुंच गए और उन्होंने कवरेज के लिए आए पत्रकारों को अपने गेस्ट हाउस में बुलाकर बातचीत करना उचित समझा। पूर्व राष्ट्रपति के साथ वन टु वन बातचीत करना, फोटो खिंचवाना और नाश्ता करना पत्रकारों के लिए दुर्लभ अवसर था। राष्ट्रपति रहते हुए वे झाबुआ जिले के एक गांव में एक कार्यक्रम में वक्त से पहले पहुंच गए और उन्होंने बच्चों से खुलकर बातचीत की। उस कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट आदेश दे रखे थे कि उन्हें बच्चों से दूर न रहने दिया जाए। इसलिए उस समारोह में तमाम सुरक्षा व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर ‘डी’ की जगह रखी ही नहीं गई थी। आमतौर पर अतिविशिष्ट लोगों के कार्यक्रम में मंच से आम लोगों की दूरी 50-60 मीटर दूर तो रखी ही जाती है। इस कार्यक्रम में बच्चों और उनके बीच केवल इतनी दूर थी कि बिना किसी माइक के भी वे बच्चों से बात कर सकें।

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आईआईएम अहमदाबाद के कार्यक्रम में डॉ. कलाम मुख्य वक्ता थे। कार्यक्रम देर शाम को था और उसके बाद डॉ. कलाम के साथ 60 प्रतिभावान चुने गए विद्याथ्रियों को डिनर करना था। राष्ट्रपति की परंपरा के अनुसार कार्यक्रम मिनट-दर-मिनट तय था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भोजन कक्ष में एक विद्यार्थी ने उनसे निवेदन किया कि वह उनके साथ फोटो खिंंचवाना चाहता है। कॉलेज के प्राचार्य ने उस विद्यार्थी को डांट दिया और कहा कि यह समय फोटो खिंचवाने का नहीं है। डॉ. कलाम ने स्थिति संभाली और प्राचार्य से कहा कि वे उनके और विद्यार्थियों के बीच में एक शब्द भी ना कहें। फिर डॉ. कलाम ने हर एक विद्यार्थी से न केवल बातचीत की, बल्कि हर एक के साथ फोटो भी खिंचवाया। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि डॉ. कलाम की दिनचर्या का एक-एक पल पूर्व निर्धारित होता था। डिनर के वक्त विद्यार्थियों से चर्चा के कारण उनकी नींद प्रभावित हो सकती थी, लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की।

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विद्यार्थियों की तरफ से मिलने वाली चिट्ठियों का जवाब उनके कार्यालय से दिया जाना अनिवार्य है। हर एक चिट्ठी का जवाब तो वे नहीं लिख सकते थे, क्योंकि समय की पाबंदियां थी, लेकिन वे हर चिट्ठी को देखते जरूर थे। चिट्ठी पर दस्तखत वे खुद अपने पेन से करते थे। जरूरत पड़ने पर एक-दो लाइन अपने हस्ताक्षरों के साथ लिखना भी उन्हें पसंद था।

डॉ. कलाम ने कभी भी राष्ट्रपति भवन के अर्दली को अपने जूतों के फीते नहीं बांधने दिए। वे खुद सोफे या कुर्सी पर बैठकर अपने जूते पहनते और उसके फीते बांधते थे। 75 साल की उम्र में भी उन्होंने अपने किसी अर्दली को यह सेवा नहीं करने दी। एक कार्यक्रम में उन्होंने मंच पर जाकर कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया, क्योंकि वह कुर्सी राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद के हिसाब से विशेष तौर पर उनके लिए रखी गई थी। उन्होंने कहा कि मंच पर रखी हुई अतिथियों के सभी कुर्सियां समान होनी चाहिए। वे इस का़र्यक्रम में विद्यार्थियों से चर्चा करने आए थे। राष्ट्रपति पद की किसी औपचारिकता में नहीं। जब वे डीआरडीओ में प्रभारी थे, तब डीआरडीओ की तरफ से स्कूली बच्चों के लिए एक प्रदर्शनी आयोजित की। डॉ. कलाम ने अपने सभी कार्यालयीन सहयोगियों से कहा कि वे अपने बच्चों को प्रदर्शनी दिखाने के लिए लेकर आएं। जब प्रदर्शनी शुरू हुई, तो उनके एक प्रमुख सहयोगी अकेले ही खड़े थे। डॉ. कलाम ने उनसे पूछा कि आपके बच्चे कहा हैं। उस सहयोगी ने कहा कि काम की अधिकता के कारण वो अपने बच्चों को नहीं ला पाया। डॉ. कलाम ने खुद उस सहयोगी के घर जाकर उनके बच्चों को अपनी कार में बैठाया और पूरी प्रदर्शनी का अवलोकन कराया। डॉ. कलाम के इस कार्य से उनके सभी सहयोगी भावविव्हल हो गए।

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डॉ. कलाम खुद वैज्ञानिक थे, इसलिए उम्र के किसी भी मोड़ पर कोई भी नई तकनीक उनसे अचूकी नहीं रही। सोशल मीडिया पर भी वे सक्रिय रहते थे और अपनी निजी वेबसाइट्स से भी अपने विचारों का प्रचार करते थे। याहू वेबसाइट के एक सेक्शन याहू एन्सर्स में किसी बच्चे ने उत्तर पाने की आशा में सवाल किया था कि हम अपने गृह को आतंकवाद के साये से कैसे मुक्त करा सकते है? डॉ. कलाम ने वह सवाल देखा और अपने विचार उस पर व्यक्त कर दिए। इस जवाब के बाद ही भारत की अनेक महत्वपूर्ण शख्सियतों ने इस तरह के सवाल-जवाब की महत्ता समझी और श्रीश्री रविशंकर, किरण बेदी, लियंडर पेस जैसे अनेक लोगों ने सवाल-जवाब की परंपरा शुरू कर दी।

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डॉ. कलाम को मिसाइलमैन कहा जाता है। भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने में भी उनका योगदान उल्लेखनीय हौ। उपगृह छोड़ने की भारत की शक्ति की परिकल्पना करने वालों में वे भी है। उनकी परिकल्पना के कारण ही भारत न केवल अपने बल्कि दूसरे देशों के भी उपगृह बेहद कम खर्च पर प्रक्षेपित कर पा रहा है। इसरो और डीआरडीओ को इतनी ऊंचाई पर ले जाने वाले वे ही है। उनकी बनाई मिसाइलों के कारण ही भारतीय सेना की मारक क्षमता चीन और पाकिस्तान तक पहुंच रखती है। डॉ. कलाम ने इन वैज्ञानिक संस्थाओं के गठन और विकास में प्रमुख भूमिका निभाई दे। दिलचस्प बात यह है कि भारत को इतनी ऊंचाई पर ले जाने वाला अंतरिक्ष अभियान ओडिशा में समुद्र किनारे एक चर्च में शुरू किया गया था और पहले रॉकेट के कलपुर्जे साइकिल और बैलगाड़ी में लादकर लाए गए थे। अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने वाले उपगृह पीएसएलवी के निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत के चन्द्रमा और मंगल अभियानों में भी डॉ. कलाम का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। पोकरण में परमाणु विस्फोट में भी इनकी भूमिका रही है, लेकिन इस सबके बावजूद उनके जीवन का लक्ष्य यहीं रहा है कि विश्व में शांति हो और दुनिया के सभी लोग और पर्यावरण स्वस्थ रहे। भारत की प्राकृतिक वनस्पति संपदा का सम्पूर्ण सदुपयोग नहीं हो पाने का उन्हें अफसोस था। चिकित्सा के क्षेत्र में वे क्रांति करना चाहते थे और चाहते थे कि गरीब से गरीब आदमी को बेहतर से बेहतर सुविधा मिलनी चाहिए। बायपास सर्जरी के मामले में उनकी कोशिश थी कि उसकी लागत कम होनी चाहिए और जिन ह्रदयरोगियों को ह्रदय के वाल्व बदलने की जरूरत है, उन्हें सस्ते से सस्ते वाल्व उपलब्ध कराए जाने चाहिए। उन्होंने अपने निजी प्रयास से राष्ट्रपति पद पर रहते हुए इस दिशा में कदम उठाया और डेढ़ से दो लाख रुपए तक में इम्पोर्ट किए जाने वाले वाल्व भारत में ही दस हजार रुपए में मरीजों को उपलब्ध कराने की शुरुआत की। दुर्भाग्य की बात है कि आधुनिक अस्पतालों के व्यावसायिक नजरिये के कारण यह अभियान सफल नहीं हो पाया। आधुनिक अस्पतालों में चल रही कमीशनखोरी ने डॉ. कलाम के सपने की निर्मम हत्या कर दी।

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