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कहीं जूते गांठते हुए, तो कहीं

चाय बेचते हुए साहित्य सृजन

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साहित्य की सेवा के लिए बड़े पद पर होना जरूरी नहीं है, न ही उसके लिए बहुत पैसे होने वाला आवश्यक है। पाकिस्तान के शायर मुनव्वर शकील और भारत के दिल्ली में रहने वाले लक्ष्मण राव ने यह बात साबित कर दी है। मुनव्वर शकील की पांच किताबें साया हो चुकी हैं और छठीं का मसौदा मुकम्मल हैं। यह छठीं किताब गजलों की होगी और इसमें 112 गजलें शामिल हैं। पेशे से मुनव्वर शकील पाकिस्तान के फैसलाबाद के एक छोटे से कस्बे रोडाला में सड़क किनारे मोची की दुकान लगाते हैं और जूते सुधारते हैं। इससे उनका गुजारा नहीं हो पाता, तो सुबह-सुबह अखबार फरोशी भी कर लेते हैं। दिल्ली में रहने वाले लक्ष्मण राव 63 साल के हैं और फुटपाथ पर चाय की दुकान चलाते हैं। लक्ष्मण राव की 44 किताबें आ चुकी हैं। दोनों में समानता यह है कि उनकी दुकान पर जाकर आप किताब भी खरीद सकते हैं और साहित्य की चर्चा कर सकते हैं।

मुनव्वर शकील 46 साल के हैं। बचपन में ही उनके पिता का इंतकाल हो गया था। आर्थिक परेशानी के कारण वे स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए। अपनी मातृभाषा पंजाबी में वे 13 साल की उम्र से ही कविताएं लिखने लगे। आर्थिक व्यवस्था के लिए उन्होंने अपने पिता की पारंपरिक दुकान संभाली और सड़क किनारे जूते गांठने लगे। इसमें भी गुजारा नहीं होता, तो सुबह-सुुबह अखबार बांटना भी शुरू कर दिया। रोज लगभग 300 रुपए कमाने वाले मुनव्वर अपनी कमाई में से रोज 10 रुपए अपनी किताबों के लिए अलग से जमा कर देते हैं। 2004 में 35 साल की उम्र में उनकी पहली किताब ‘सोच समंदर’ प्रकाशित हुई। एक साल बाद ही ‘परदेस दी संगत’ बाजार में आई और फिर 2009 में तीसरी किताब ‘साड्डियां दी भैत’ प्रकाशित हुई। इसके दो साल बाद ‘झोरा धाप गवाची दा’ और फिर उसके दो साल बाद ‘अखां मिट्टी हो गइयां’ प्रकाशित हुई।

मुनव्वर शकील की पांचों किताबों को साहित्यिक पुरस्कार मिल चुके हैं। पाकिस्तान की रॉयल अदबी एकेदमी से वे जुड़े हैं। पाकिस्तान राइटर्स गिल्ड, आशना-ए-संदल बार, नकीबी कारवां-ए-अदब और पंजाबी सेवक जैसी संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें पिछले साल एक लाख रुपए का पुरस्कार देने की बात कहीं थी, लेकिन नौकरशाही के चलते उन्हें वह पैसा नहीं मिला। 5 बेटियों और 2 बेटों के पिता मुनव्वर की माली हालत ठीक नहीं।

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मुनव्वर शकील की गजलें और नज्में पाकिस्तान के निम्न आय वर्ग वाले समाज पर केन्द्रीत हैं। उनका कहना है कि मैं अपनी शायरी से पाकिस्तान के गरीब और मजलूम लोगों की बातें करता हूं। ये ऐसी बातें हैं जो मैं सीधे-सीधे नहीं कह सकता। मुझे अपने जूते सुधारने के काम में न तो कोई ऐतराज है और न ही कोई शर्म। मुनव्वर यह सारा काम अपने खुद के संतोष के लिए करते हैं। वे हर रोज कम से कम चार घंटे किताबें पढ़ते हैं। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने और फिर कॉलेज जाने का सपना उन्होंने भी देखा था, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। अब वे शायरी करते हैं और इसे सुकून वाली बात मानते हैं। मुनव्वर शकील की भावपूर्ण शायरी का नमूना-

इन्नू किन्ने पानी दीत्ता, इन्नू किन्ने बोया अए ।

पत्थर दे जो सीने उठ्ठे, बूटा उग्या होया अए ।।

वह जो इनको पानी देता हैं, वह जो इन्हें बोता है, जब ये अंकुर उगते हैं, तब पत्थरों का सीना चीर कर उगते हैं।

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मुनव्वर शकील कोई अकेले साहित्यकार नहीं हैं, जो जीवन यापन के लिए फुटपाथ पर बैठकर कारोबार करते हैं। नई दिल्ली के ही आईटीओ एरिया में हिन्दी भवन के सामने फुटपाथ पर चाय बेचने वाले लक्ष्मण राव भी साहित्य जगत से जुड़े हुए हैं। लक्ष्मण राव करीब 63 साल के हैं और उनकी 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लक्ष्मण राव का कहना है कि मैं ये किताबें अपने शौक और जुनून के लिए लिखता हूं, इनसे मुझे कोई कमाई नहीं होती, लेकिन इन किताबों के बहाने मुझसे बात करने के लिए कई बुद्धिजीवी आते हैं और हम चाय पर चर्चा करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। लक्ष्मण राव बचपन से अब तक चाय ही बेच रहे हैं पर वे अपने इस काम से खुश हैं। उनकी पहली किताब 1979 में प्रकाशित हुई थी, जिसका नाम था ‘नई दुनिया की नई कहानियां’। उसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने लक्ष्मण राव के बारे में एक फोटो फीचर छापा और उसके बाद तो फिर लक्ष्मण राव मीडिया का एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए। अखबारों में उनके बारे में कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं और टीवी चैनलों पर भी उनके इंटरव्यू आ चुके हैं। इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा ताई पाटिल ने भी उन्हें मिलने के लिए बुलवाया था और उनके काम की तारीफ की थी।

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लक्ष्मण राव अपनी किताबें खुद ही प्रकाशित करवाते हैं और पाठकों के लिए अपनी दुकान पर उन्हें उपलब्ध भी करवाते हैं। किताबों के धंधे से, लिखने या बेचने से उनकी आजीविका नहीं चल पाती, इसलिए चाय की दुकान उनकी मजबूरी है। वे कहते हैं कि 20 साल से मेरी किसी किताब पर मुझे कोई कमाई नहीं हुई। लक्ष्मण राव आधा दिन चाय की दुकान संभालते हैं वे चाय बनाते, बेचते और हिसाब-किताब रखते हैं। आधे दिन के बाद उनका बड़ा बेटा आकर यह जिम्मेदारी संभाल लेता हैं और लक्ष्मण राव अपनी साइकिल उठाकर लाइब्रेरियों के चक्कर लगाते हैं। उनका मानना है कि सलमान रश्दी और विक्रम सेठ जैसे लेखक भारतीय समाज से कटे हुए हैं और उन्हें आम आदमी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। लक्ष्मण राव की किताबों में 18 उपन्यास शामिल हैं। उनके लेखों का एक संकलन भी बाजार में आया हैं, जिसमें उन्होंने भारतीय समाज की परेशानियों के बारे में लिखा है। उनकी 24 में से 6 किताबों के दूसरे संस्करण भी प्रकाशित हुए हैं। दिन में दुकान संचालित करने के अलावा रात को वे पढ़ाई भी करते रहे हैं और बीए तथा एमए की डिग्री उन्होंने चाय की दुकान चलाते हुए ही अर्जित की।

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