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मीडिया भले ही उसे मंदी न कहे, स्लो डाउन या कुछ और कहे या कुछ भी न कहे पर मंदी तो है। यूएसए की हालत मंदी में पतली हो रही है। चीन का भी यही हाल है। यूके, जर्मनी, फ्रांस सब इसी अंधड़ के शिकार हैं। भारतीय मीडिया मंदी की खबरों को नहीं दिखाता। सेंसेक्स के पांच सौ अंक नीचे गिरने तक की खबरें पूरी तरह गायब कर दी जाती है। बाजार खाली पड़े हैं और उस पर कोई चर्चा नहीं होती। अखबारों के पन्नों से, टीवी चैनलों और होर्डिंग्स से विज्ञापन लगातार लापता होते जा रहे हैं। मीडिया को यह डर है कि अगर उसने मंदी की खबरों को दिखाया, तो इसका बाजार पर और भी उल्टा असर पड़ेगा।

अमेरिका में मंदी जोरों पर है। बड़ी-बड़ी कंपनियां संविलयन और अधिग्रहण में जुटी है। तेल कंपनियां, खनन कारोबारी, खाद्य पदार्थ निर्माता, मोबाइल और नेटवर्क कंपनियां- लगभग सभी क्षेत्रों में मुनाफा कमाने के लिए कर्मचारियों की छटनी की जा रही है या उसे लेऑफ दिया जा रहा है। मोटोरोला, लेनोवो, एचटीसी, क्राफ्ट, टायसन जैसी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर लेऑफ दे रही है। हेंज ने 2500 कर्मचारियों को लेऑफ दे दिया। हेथ-वे ग्रुप बर्कशायर में 700 कर्मचारियों को छुट्टी दे रहा है। लेनोवो 3200 कर्मचारियों को लेऑफ दे रहा है। मोटोरोला ने 500 लोगों को हटा दिया है। एचटीसी ने 2250 लोगों की नौकरी खत्म कर दी है। माइक्रोसॉफ्ट ने 7800 पर ही खत्म कर दिए। सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनी क्यूलकॉम ने 4700 कर्मचारियों के लेऑफ दे दिया है।

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कोयला खनन के क्षेत्र में अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी अल्फा नेचुरल रिसोर्सेस ने 8000 कर्मचारी कम कर दिए। तेल क्षेत्र में पिछले एक साल में एक लाख पचास हजार नौकरियां खत्म हो गई। रॉयल डच शेल कंपनी ने 6500 लोगों को निकाल दिया है। विश्व की पांचवी सबसे बड़ी खदान कंपनी एंगलो अमेरिकन 53000 लोगों को निकालने की तैयारी में है।

हर छोटी कंपनी बड़ी कंपनी की तरफ देख रही है कि उसे कोई ग्राहक मिलता है या नहीं। अपनी बैलेंसशीट अच्छी बनाने के लिए कंपनियां मुनाफा दिखाने को मजबूर है। इसके लिए कर्मचारियों की बली चढ़ाई जा रही है। अमेरिका में इस साल कंपनियों के विलय और अधिग्रहण की गतिविधियां सबसे ज्यादा नजर आ रही है। बैंकों ने अरबों डॉलर बाजार में फेंक दिए हैं, ताकि कंपनियों का विलय और अधिग्रहण हो सके। यह सब ऐसे वक्त पर हो रहा है, जब मंदी की मार पूरा विश्व झेल रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार 2009 के बाद 2015 सबसे खराब वित्तीय वर्ष रहने वाला है। चीन की आर्थिक बदहाली ने आग में घी का काम किया है।

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अमेरिका में यह सब हो रहा है बावजूद इसके कि नए रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे है, जो रोजगार हैं उनमें वेतन अनुपात में नहीं बढ़ा है। बड़े-बड़े औद्योगिक घराने तोड़-जोड़ करके अपनी बैलेंसशीट सुधार रहे है। समाज विज्ञानी कह रहे है कि विकास के लिए मानव अधिकार और पर्यावरण की भारी अवहेलना हो रही है। ऐसे में हम भारत वाले अमेरिका की ओर टकटकी लगाकर देखते है, तो उसका परिणाम क्या होगा?

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