
दुनिया के 50 से ज्यादा देश ऐसे हैं, जिनकी आबादी इंदौर से कम है। इंदौर भले ही मध्यप्रदेश की राजधानी न हो, वह यूएसए की राजधानी वाशिंगटन, फ्रांस की राजधानी पेरिस और कनाडा की राजधानी ओटावा से बड़ा शहर है। इस शहर ने देश को कई ऐसी शख्सियतें दी हैं, जिन्होंने दुनिया में नाम कमाया है। लता मंगेशकर, एमएफ हुसैन, उस्ताद बड़े अमीर खां साहब, सलमान खान तो उनमें से कुछ नाम ही हैं। इंदौर में ऐसे अनेक सितारे अब भी रहते है, जिन्हें लोग बहुत अच्छी तरह नहीं जानते। उन्हीं सितारों से परिचित कराने के लिए रमण रावल ने अपनी किताब इंदौर के सितारे की दूसरी कड़ी प्रकाशित की है।
इंदौर के सितारों पर रमण रावल की दूसरी किताब भी आ गई है। मई 2014 में इंदौर के सितारे शीर्षक से एक किताब बाजार में आई थी, जिसमें इंदौर की उन 50 प्रतिभाओं पर आलेख थे, जिन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है। उसी सीरिज की अगली कड़ी है इंदौर के सितारे-2। 18 अक्टूबर को इस किताब के विमोचन के अवसर पर रमण रावल ने ऐलान किया कि वे इसी सीरिज की अगली किताब की तैयारी में भी जुटे हैं। 2016 में इस सीरिज की तीसरी किताब बाजार में आने की संभावना है।

पहली किताब में इंदौर के 50 सितारें शामिल थे, तो दूसरी किताब में केवल 36 सितारें हैं। इस बार सितारों को ज्यादा जगह दी गई है, उनके साथ उनके परिजनों की तस्वीर भी है और परिचयात्मक जानकारी भी। विमोचन समारोह में ही स्पष्ट कर दिया गया कि यह किताब कोई बिल गेट्स के बारे में नहीं है। यह किताब उन लोगों के बारे में है, जिन्होंने देश के 14वें बड़े शहर इंदौर में अपनी मेहनत से अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है। बेशक, इसमें कुछ नाम ऐसे भी है, जिनकी ख्याति विश्व स्तर की है और कुछ ऐसे हैं, जिन्हें गुदड़ी का लाल कहा जा सकता है।
इंदौर के सितारों में व्यवसायी, चिकित्सक, विधि व्यवसायी, संस्कृतिकर्मी, होटल उद्योग से जुड़े लोग, शायर, संगीतकार, ज्योतिषी, गायक, शिक्षा शास्त्री, खिलाड़ी, मीडिया संस्थान मालिक, बिल्डर, डिजाइनर और रेडियो जॉकी शामिल हैं। एक कमी इस किताब में अखरती है कि इन 36 सितारों में महिला केवल एक ही है। पुस्तक के विमोचन समारोह में इन सितारों में से अनेक उपस्थित थे और उनसे मिलना एक अलग अनुभव था।

इस किताब को पढ़कर पता चलता है कि इंदौर केवल सेंव-नमकीन और मिठाई के लिए ही नहीं, उन अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के लिए भी जाना जाता है, जिन्होंने इंदौर से शुरूआत की। राहत इंदौरी, मानसिंह परमार, डॉ. शंकरलाल गर्ग जैसों की अपनी अलग पहचान है ही। आचार्य पंंडित गोकुलोत्सव महाराज, नरहरि पटेल, जयंत भिसे, सुमन चौरसिया, चिंतन बाकीवाला आदि खुद अपने आप में ब्रांड हैं। इस पुस्तक में अपना स्वीट्स के प्रकाश राठौर की कहानी भी है, जो इंदौर के हल्दीराम कहे जा सकते हैं। इसमें सेठ हुकमचंद के खानदान वाले प्रदीप कासलीवाल की कहानी भी है और गुरुकृपा भोजनालय के पुरुषोत्तम शर्मा की दास्तान भी। शक्ति पंप के दिनेश पाटीदार, गगन लेदर हाऊस के मुकेश पाटीदार, वास्तु शास्त्री पंकज अग्रवाल, गणेश केप मार्ट के गणेश गौरी, शंकर भावसार, ज्योतिषी रामचन्द्र शर्मा, बिल्डर अभिषेक झंवेरी, पिंटू छाबड़ा, अनिल अग्रवाल और पुलिस वाले से व्यवसायी बने प्रवीण कक्कड़, पटेल मोटर्स वाले अरविंद पटेल, इंदौर के तीन मॉल के संचालक पिंटू छाबड़ा, व्यवसायी लक्ष्मीनारायण गुप्ता, इंटीरियर डेकोरेटर जया जुनेजा, विश्व कीर्तिमान बनाने वाले आयरनमैन संजय दूबे, महिदपुर फर्नीचर वाले शेख हैदर हुसैन, बाबू भाई, होटल व्यवसाय से जुड़े सुमित सुरी, डॉ. हेमंत डोसी, डॉ. अरुण अग्रवाल और डॉ. अनिल दशोरे, मीडिया टायकून ह्रदयेश दीक्षित, कोचिंग संचालक अजय बंसल, चार्टर्ड अकाउंटेंट श्याम भाटिया, समाज पेपर मार्ट वाले जवाहर लाल नेमा, विधि व्यवसायी सुनिल गुप्ता आदि के बारे में रोचक जानकारियां दी गई है। अंतिम आलेख रेडियो जॉकी समीर चिंचवड़कर के बारे में है, जिससे पता चलता है कि वे कभी रंगमंच पर रोमिया भी बना करते थे।

रमण रावल की यह किताब इंदौर की शख्सियतों को समझने में मददगार होगी। इसमें उन लोगों की कहानियां है, जिन्हें हम जानते तो है, लेकिन पहचानते नहीं। सरसरी तौर पर जाने जानेवाले लोगों को भीतर से पहचानना दिलचस्प है।