
गांधीवादी नेता मोरारजी देसाई ऐसे खब्ती नेता थे, जिनसे बात करना बहुत मुश्किल होता था। मुझे तीन बार उनसे मिलने का मौका मिला। ये मुलाकातें उनके मुंबई के नरीमन पाइंट स्थित घर पर हुई। वे भारत के प्रधानमंत्री रह चुके थे। उन पर तमाम आरोप लगे थे और बाद में भी लगते रहे। आरोपों से हमेशा अविचलित रहने वाले मोरारजी देसाई मुझे एक शिक्षक की तरह लगे।
इन तीन मुलाकातों में से एक मुलाकात तो केवल 30 सेकेंड की थी। उन्होंने मुझे शाम पांच बजे का समय दिया था और टैक्सी नहीं मिलने से मैं पांच बजकर पांच मिनिट पर पहुंच सका था। पहले तो उनके पीए ने ही मुझे रोक दिया, लेकिन बहुत जिद करने के बाद उसने मुझे मोरारजी देसाई तक जाने दिया। मोरारजी ने मुझसे पूछा- कितने बजे बुलाया था मैंने?
मैंने कहा- पांच बजे।
मोरारजी देसाई ने कहा कि अपने हाथ की घड़ी निकालकर कूड़ेदान में डाल दो और दफा हो जाओ। जिन लोगों को वक्त की कद्र नहीं, मैं उनसे बात नहीं करता। काफी मिन्नत के बाद भी वे नहीं पिघले, लेकिन इस घटना ने मुझे एक बहुत बड़ी शिक्षा दी। भविष्य में कभी भी किसी भी इंटरव्यू के लिए लेट नहीं हुआ। मैंने नियम बना लिया कि तय समय से 15 मिनिट पहले पहुंच ही जाया जाए।

मोरारजी देसाई से दूसरी मुलाकात मेरी तब हुई थी, जब उन पर सीआईए का एजेंड होने का आरोप लगा था। उन दिनों टेलीप्रिंटर से खबरें आती थीं। दोपहर बाद एक न्यूज फ्लैश आया, जिसमें एक अमेरिकी पत्रकार ने आरोप लगाया था कि मोरारजी देसाई सीआईए के एजेंड थे। मैंने टेलीप्रिंटर की वह खबर फाड़ी और सम्पादक जी को बताकर दौड़ते हुए मोरारजी के घर जाने के लिए टैक्सी पकड़ी।
इस बार मैं बिना किसी अपाइंटमेंट के था। मोरारजी के घर के बाहर काफी लोग जमा थे। उनसे मिलने के लिए भी बहुत से लोग प्रतीक्षा कर रहे थे। मोरारजी के पुत्र कांति देसाई आने वालों के बातचीत कर रहे थे। मैंने कांति भाई से कहा- मैं नवभारत टाइम्स से आया हूं और मुझे अभी हाल मोरारजी भाई से मिलना है।
कांति भाई ने मुझे देखा फिर मोरारजी देसाई से मिलने वालों की तरफ एक नजर डाली और मुझे अंदर जाने की अनुमति दे दी। शायद यह पहला मौका था, जब मोरारजी देसाई ने किसी पत्रकार को बिना किसी अपाइंटमेंट के आने दिया। वे बिल्कुल भी विचलित नहीं थे। उन्होंने दृढ़ता से सभी आरोपों को बे-बुनियाद बताया और मुझे रुखसत कर दिया। जब मैं बाहर आया, तब कांति भाई देसाई ने मुझे कहा कि आप जिन लोगों को इंतजार करता हुआ छोड़ गए थे, वो कौन थे, क्या तुम्हें मालूम है?
मैंने कहा- नहीं। कौन थे?
कांति भाई ने कहा- एक तो श्रेयांश प्रसाद जी थे, टाइम्स ऑफ इंडिया वंâपनी के मालिकों में से एक। मैं एसपी जैन साहब को नहीं पहचानता था। खैर, दफ्तर आकर मैंने संपादक जी को सारी बातें बताई। वे केवल मुस्कुरा दिए।
मोरारजी भाई देसाई से तीसरी मुलाकात दिनमान पत्रिका के लिए एक इंटरव्यू लेने के उद्देश्य से हुई थी। यह इंटरव्यू 3 अक्टूबर 1982 के दिनमान में छपा भी था। 37 मिनिट तक मोरारजी देसाई ने मेरे सभी सवालों के जवाब दिए। अजी, जवाब क्या दिए, हर प्रश्न के जवाब में उनका एक प्रति प्रश्न होता था, लेकिन मुझे बहुत मजा आया। दिनमान में जब वह इंटरव्यू छपा तब उसकी बहुत चर्चा हुई।
इस इंटरव्यू में मोरारजी देसाई से मैंने पूछा था कि क्या वे सचमुच शिवाम्बु (स्वमूत्र) पान करते हैं? यह पूछा था कि वे जिस गाय का दूध पीते हैं, क्या सचमुच उसे काजू-बादाम खिलाए जाते हैं? क्या इंदिरा गांधी सचमुच तानाशाह थीं? क्या आप समझौते के तहत इंदिरा गांधी के दौर में उपप्रधानमंत्री बने थे? क्या दत्ता सामंत की मिल हड़ताल गांधीजी द्वारा अहमदाबाद में कराई गई मजदूरों की हड़ताल से अलग थी? क्या आप सचमुच ग्राम पंचायतों के अधिकार बढ़ाना चाहते थे? क्या गांधीवादी संस्थाएं ठीक से काम कर रही हैं? प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर आपके प्रधानमंत्री रहते, जो काम हुए क्या उससे समाज को वाकई कोई फायदा हुआ?
मोरारजी देसाई पुराने ब्यूरोक्रेट थे। आजादी की लड़ाई में तीन बार बरसों तक जेल में रहे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उन्होंने बड़ी सरकारी नौकरी छोड़ी थी। आजादी के बाद वे महाराष्ट्र (मुंबई प्रोविंस) के पहले मुख्यमंत्री बने थे। प्रधानमंत्री बनना उनका सपना था और 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक वे भारत के पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे। दिलचस्प बात यह है कि जब वे प्रधानमंत्री बने, तब उनकी उम्र 81 साल की थी और अपने जीवन के 100वें वर्ष में उनका निधन हुआ था। वे एक बेबाक और बेखौफ नेता थे। उनके जैसा अनुशासित नेता कोई नहीं देखा।