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लोग अपनी बेटियों के नाम गंगा, जमुना, कांवेरी, गोदावरी, तीस्ता आदि रखते हैं, कोई भी अपनी बेटी का नाम चम्बल क्यों नहीं रखता? यह सवाल उठा चम्बल क्षेत्र के विधायक पुत्र राकेश रुस्तम सिंह की संस्था सामाजिक समरसता मंच के बैनर तले चम्बल गौरव कार्यक्रम में। चम्बल क्षेत्र के विकास के लिए गठित सामाजिक समरसता मंच ने एक नई पहल की है। जिसके तहत चम्बल के पुरातत्व, चंबल के बीहड़ और प्रकृति से दुनिया को परिचित कराने का अभियान शुरू किया गया है। 

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इस कड़ी में देशभर के चित्रकारों को चम्बल क्षेत्र में बुलाकर बीहड़ों से सटे चम्बल तट पर तीन दिन का एक शिविर लगाया गया, जिसमें कलाकारों ने चम्बल के चित्र बनाए। इसके अलावा मिनि मैराथन और परिचर्चाओं का आयोजन भी किया गया। इन परिचर्चाओं में देश के जाने-माने पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विचारकों ने हिस्सा लिया। मुझे भी इस आयोजन में जाने का मौका मिला और कार्यक्रम में शरीक डॉ. वेदप्रताप वैदिक, श्रवण गर्ग, डॉ. रामकृपाल सिंह, सुमंत भट्टाचार्य, सुधीर सक्सेना, सोपान जोशी, अनिल सोमित्र, बीके भारतीय और ग्वालियर के ही लब्ध प्रतिष्ठ पत्रकार राकेश अचल और राकेश पाठक से मुलाकात कर चर्चा करने और वहां के कई महत्वपूर्ण स्थानों को देखने का मौका मिला। 

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चम्बल की इस यात्रा के पहले मुझे कोई कल्पना नहीं थी कि चम्बल क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की इतनी गतिविधियां है और इतने महत्वपूर्ण स्थान चम्बल में है। इस क्षेत्र के कई मंदिर और अन्य स्थान तो खजुराहो से भी पहले के हैं। इसी के साथ चम्बल क्षेत्र के बीहड़ों को नजदीक से देखने का मौका भी मिला। यह धारणा खत्म हुई कि चम्बल के बीहड़ का अर्थ केवल डावूâ होते है। कार्यक्रम के संयोजन राकेश रुस्तम सिंह और जयंत तोमर तथा उनके साथियों ने रूप रेखा ही कुछ ऐसी बनाई थी कि कार्तिक पूर्णिमा की रात चांदनी ने चम्बल और उसके बीहड़ों में जाया जा सके। चम्बल के बीहड़ों की सुंदरता चांदनी रात में और भी बढ़ गई थी और चम्बल का पानी चांदी की रेखा की तरह चमक रहा था। कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि महू के पास जानापाव से जो चम्बल निकलती है, उसका स्वरूप इतना विशाल और सुंदर होगा। 

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समय की कमी के कारण चम्बल में मगरमच्छों और घड़ियालों वाले इलाके में नहीं जा सके और अभ्यारण्य में भी नहीं घूम सके, लेकिन सरसों के खेतों से गुजरते हुए धूल भरी सड़कों पर जाते हुए हम बटेसर, पड़ावली, मितावली, शनिश्चरा मंदिर आदि के दर्शन किए। सभी जगहें एक से बढ़कर एक और अद्भुत। अफसोस हुआ कि हम पहले यहां क्यों नहीं आए? इस बात का भी अफसोस हुआ कि काश हम यहां अधिक समय के लिए आए होते। 

मितावली की पर्वत शृंखला पर तो योगिनी मंदिर एक अद्भुत वास्तुशिल्प लगा। इस मंदिर की संरचना ऐसी है मानो भारत का संसद भवन। यह मंदिर 9वीं और 10वीं सदी का माना जाता है। इस मंदिर में 63 छोटे मंदिर, एक गोलाकार रूप में है और बीचो-बीच एक स्वतंत्र मंदिर। ऐसा कहा जाता है कि सर लुटियन ने भारतीय संसद भवन की इमारत बनाने के पहले यहां का दौरा किया था। इस 64 योगिनी मंदिर में सभी मंदिर भगवान शिव के है। मध्य के गोल मंदिर में शिवजी के साथ पार्वती भी है। इस मंदिर का इतिहास अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है। 

ग्वालियर से करीब 25 किलोमीटर दूर प्रतिहार शैली के मंदिरों का समूह भी है। ये मंदिर सातवीं सती के आसपास के बताए जाते है। कुछ लोग कहते है कि इनका निर्माण 900 से 1000 ईसवीं के बीच हुआ था। करीब 200 मंदिरों के इस समूह के अधिकांश मंदिर अपना मूल स्वरूप खो चुके थे, उन्हें भारतीय पुरातत्व विभाग फिर से सजीव करने में जुट गया है। 

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पुरातत्व के नजरिये से महत्वपूर्ण इन स्थानों के अलावा चम्बल के बीहड़ भी अपने आप में रहस्य और रोमांच छुपाए हुए है। इतने सुंदर बीहड़ सैकड़ों साल में प्राकृतिक रूप से अपने आप बने हैं। कुछ बीहड़ों में तो 30 से 40 मीटर ऊंचे डूंड हैं। इनके बीच से पैदल ही जाया जा सकता है। कहीं-कहीं इतनी जगह है कि वाहन गुजर सके। यहां की मिट्टी अखाड़ों की मिट्टी जैसी कोमल है। 

भारत सरकार ने इन बीहड़ों की करीब पांच हजार हेक्टेयर जमीन का उपयोग उद्योगों के लिए करने का फैसला किया है। यह फैसला मुझे उचित नहीं लगता, क्योंकि बीहड़ हम दुबारा नहीं बना सकते। हमें उद्योगों के नाम पर बीहड़ों की प्राकृतिक सुंदरता को नष्ट नहीं करना चाहिए। यह बात परिसंवाद में मैंने पुरजोर तरीके से रखी। मेरा विचार है कि इन बीहड़ों को संंवारा जाना चाहिए और पर्यटकों को यहां लाने का प्रयास करना चाहिए।

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मितावली का 64 योगिनी मंदिर :  चित्र  - अस्मि सक्सेना

चम्बल क्षेत्र में अभी रोजगार के साधनों की कमी है। यह क्षेत्र उतना विकसित नहीं है, जितना मालवा या भोपाल का क्षेत्र। इस क्षेत्र में उद्योग धंधे तो लगाए ही जा सकते है, पर्यटकों को भी इस क्षेत्र में आकर्षित किया जा सकता है, अगर यहां की आधारभूत संरचना में सुधार हो। इतनी महत्वपूर्ण पुरा संपदा के होते हुए भी यह क्षेत्र अल्पविकसित क्यों है यह विचारणीय मुद्दा है।

लोअपनी बेटियों के नाम गंगा, जमुना, कांवेरी, गोदावरी, तीस्ता आदि रखते हैं, कोई भी अपनी बेटी का नाम चम्बल क्यों नहीं रखता? यह सवाल उठा चम्बल क्षेत्र के विधायक रुस्तम सिंह की संस्था सामाजिक समरसता मंच के बैनर तले चम्बल गौरव कार्यक्रम में। चम्बल क्षेत्र के विकास के लिए गठित सामाजिक समरसता मंच ने एक नई पहल की है। जिसके तहत चम्बल के पुरातत्व, चंबल के बीहड़ और प्रकृति से दुनिया को परिचित कराने का अभियान शुरू किया गया है। इस कड़ी में देशभर के चित्रकारों को चम्बल क्षेत्र में बुलाकर बीहड़ों से सटे चम्बल तट पर तीन दिन का एक शिविर लगाया गया, जिसमें कलाकारों ने चम्बल के चित्र बनाए। इसके अलावा मिनि मैराथन और परिचर्चाओं का आयोजन भी किया गया। इन परिचर्चाओं में देश के जाने-माने पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विचारकों ने हिस्सा लिया। मुझे भी इस आयोजन में जाने का मौका मिला और कार्यक्रम में शरीक डॉ. वेदप्रताप वैदिक, श्रवण गर्ग, डॉ. रामकृपाल सिंह, सुमंत भट्टाचार्य, सुधीर सक्सेना, सोपान जोशी, अनिल सोमित्र, बीके भारतीय और ग्वालियर के ही लब्ध प्रतिष्ठ पत्रकार राकेश अचल और राकेश पाठक से मुलाकात कर चर्चा करने और वहां के कई महत्वपूर्ण स्थानों को देखने का मौका मिला। 

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मितावली की पहाड़ी  :  चित्र  - अस्मि सक्सेना

चम्बल की इस यात्रा के पहले मुझे कोई कल्पना नहीं थी कि चम्बल क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की इतनी गतिविधियां है और इतने महत्वपूर्ण स्थान चम्बल में है। इस क्षेत्र के कई मंदिर और अन्य स्थान तो खजुराहो से भी पहले के हैं। इसी के साथ चम्बल क्षेत्र के बीहड़ों को नजदीक से देखने का मौका भी मिला। यह धारणा खत्म हुई कि चम्बल के बीहड़ का अर्थ केवल डावूâ होते है। कार्यक्रम के संयोजन राकेश रुस्तम सिंह और जयंत तोमर तथा उनके साथियों ने रूप रेखा ही कुछ ऐसी बनाई थी कि कार्तिक पूर्णिमा की रात चांदनी ने चम्बल और उसके बीहड़ों में जाया जा सके। चम्बल के बीहड़ों की सुंदरता चांदनी रात में और भी बढ़ गई थी और चम्बल का पानी चांदी की रेखा की तरह चमक रहा था। कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि महू के पास जानापाव से जो चम्बल निकलती है, उसका स्वरूप इतना विशाल और सुंदर होगा। समय की कमी के कारण चम्बल में मगरमच्छों और घड़ियालों वाले इलाके में नहीं जा सके और अभ्यारण्य में भी नहीं घूम सके, लेकिन सरसों के खेतों से गुजरते हुए धूल भरी सड़कों पर जाते हुए हम बटेसर, पड़ावली, मितावली, शनिश्चरा मंदिर आदि के दर्शन किए। सभी जगहें एक से बढ़कर एक और अद्भुत।

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पदावली का शिल्प :  चित्र - अस्मि सक्सेना

अफसोस हुआ कि हम पहले यहां क्यों नहीं आए? इस बात का भी अफसोस हुआ कि काश हम यहां अधिक समय के लिए आए होते। मितावली की पर्वत शृंखला पर तो योगिनी मंदिर एक अद्भुत वास्तुशिल्प लगा। इस मंदिर की संरचना ऐसी है मानो भारत का संसद भवन। यह मंदिर ९वीं और १०वीं सदी का माना जाता है। इस मंदिर में ६३ छोटे मंदिर, एक गोलाकार रूप में है और बीचो-बीच एक स्वतंत्र मंदिर। ऐसा कहा जाता है कि सर लुटियन ने भारतीय संसद भवन की इमारत बनाने के पहले यहां का दौरा किया था। इस ६४ योगिनी मंदिर में सभी मंदिर भगवान शिव के है। मध्य के गोल मंदिर में शिवजी के साथ पार्वती भी है। इस मंदिर का इतिहास अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है।

ग्वालियर से करीब २५ किलोमीटर दूर प्रतिहार शैली के मंदिरों का समूह भी है। ये मंदिर सातवीं सती के आसपास के बताए जाते है। कुछ लोग कहते है कि इनका निर्माण ९०० से १००० ईसवीं के बीच हुआ था। करीब २०० मंदिरों के इस समूह के अधिकांश मंदिर अपना मूल स्वरूप खो चुके थे, उन्हें भारतीय पुरातत्व विभाग फिर से सजीव करने में जुट गया है। पुरातत्व के नजरिये से महत्वपूर्ण इन स्थानों के अलावा चम्बल के बीहड़ भी अपने आप में रहस्य और रोमांच छुपाए हुए है। इतने सुंदर बीहड़ सैकड़ों साल में प्राकृतिक रूप से अपने आप बने हैं। कुछ बीहड़ों में तो ३० से ४० मीटर ऊंचे डूंड हैं। इनके बीच से पैदल ही जाया जा सकता है। कहीं-कहीं इतनी जगह है कि वाहन गुजर सके। यहां की मिट्टी अखाड़ों की मिट्टी जैसी कोमल है।

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बटेश्वर मंदिर के भीतर :  चित्र - अस्मि सक्सेना

भारत सरकार ने इन बीहड़ों की करीब पांच हजार हेक्टेयर जमीन का उपयोग उद्योगों के लिए करने का पैâसला किया है। यह पैâसला मुझे उचित नहीं लगता, क्योंकि बीहड़ हम दुबारा नहीं बना सकते। हमें उद्योगों के नाम पर बीहड़ों की प्राकृतिक सुंदरता को नष्ट नहीं करना चाहिए। यह बात परिसंवाद में मैंने पुरजोर तरीके से रखी। मेरा विचार है कि इन बीहड़ों को संंवारा जाना चाहिए और पर्यटकों को यहां लाने का प्रयास करना चाहिए। चम्बल क्षेत्र में अभी रोजगार के साधनों की कमी है। यह क्षेत्र उतना विकसित नहीं है, जितना मालवा या भोपाल का क्षेत्र। इस क्षेत्र में उद्योग धंधे तो लगाए ही जा सकते है, पर्यटकों को भी इस क्षेत्र में आकर्षित किया जा सकता है, अगर यहां की आधारभूत संरचना में सुधार हो। इतनी महत्वपूर्ण पुरा संपदा के होते हुए भी यह क्षेत्र अल्पविकसित क्यों है यह विचारणीय मुद्दा है।

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