
हिन्दी के जाने-माने व्यंग्यकार जवाहर चौधरी ने दलित जीवन की त्रासदी भरी घटनाओं को लेकर गमन की रचना की है। यह दलित आत्मकथा लेखन की तरह लिखा गया एक लघु उपन्यास है, जो केवल 98 पृष्ठों में भी कई ऐसी घटनाएं छोड़ जाता है, जो समाचार पत्रों और टेलीविजन न्यूज चैनलों की खबरों की तरह एक-एक करके आंखों के सामने से गुजरने लगती है। दलित त्रासदी के अलावा यह किताब धर्म की गलत व्याख्या को भी साहस के साथ उजागर करती है। आजादी के इतने साल बाद भी इस तरह की वारदातें अब भी होती है और साबित करती है कि हम अभी भी पूर्णत: सभ्य समाज नहीं बन पाए है।
इस उपन्यास में दलितों के साथ होने वाले तमाम तरह के शोषण और अत्याचार का वर्णन कुछ इस तरह है, मानो आप अपनी आंखों से वह सब देख रहे है। धर्म के नाम पर शोषण, जाति के नाम पर अत्याचार, मानसिक यातनाओं की लंबी-लंबी वारदातें पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते है। आज भी ब्राह्मण वर्ग के लोग किस तरह दूसरे वर्ग के लोगों का शोषण कर रहे है और ठाकुर कहे जाने वाले लोग किस तरह मनमानी करते है। यह पढ़ते हुए गुस्से और क्षोभ से मन भर आता है।
दलितों के शोषण में सिर्फ आर्थिक लूट ही शामिल नहीं है। दलित महिला पात्र का शारीरिक शोषण, दलित युवा इंजीनियर को जीते-जी जलाकर मार डालने की खौफनाक घटना, जमीनों पर कब्जे, फसलों की लूट जैसी अनेक वारदातें इस उपन्यास में पढ़ने को मिलती है। प्रशासन और पुलिस का तंत्र किस तरह शोषकों की मदद करता है, यह भी इस उपन्यास में वर्णित है।

इस पूरे उपन्यास में ग्रामीण लोकजीवन की झलकियां भी देखने को मिलती है। ग्रामीण समाज के रीति-रिवाज, शादी, लोकगीत, गीतों में गालियों का चलन, मंदिर और पूजा के नाम पर किया जाने वाला ढोंग तथा व्यभिचार, इस पूरे उपन्यास में रह-रहकर आता है। उपन्यास के अंत में पीड़ित दलित परिवार कोई कदम उठाने के लिए आतुर रहता है, लेकिन वहीं लेखक ने उपन्यास का समापन करना और पाठकों के सामने एक प्रश्नचिन्ह छोड़ना उचित समझा।
पूरा उपन्यास पढ़ते वक्त लगता है कि आप कोई फिल्म देख रहे है। दो बीघा जमीन, प्रतिशोध, गमन या ऐसी ही कोई फिल्म, जो हमें तथाकथित सभ्य और शहरी समाज से दूर एक बर्बर समाज की ओर ले जाती है। संभव है उपन्यास पर कोई फिल्म भी बने। इस उपन्यास ने साबित कर दिया कि अगर रचनाकार सशक्त है, तो वह एक विधा को दूसरी विधा पर हावी नहीं होने देता। फिर भी उपन्यास के अनेक पन्नों पर यह झलक जरूर मिलती है कि रचनाकार की निगाहें किसी व्यंग्यकार की तरह ही पैनी है।
पुस्तक : गमन (लघु उपन्यास)
लेखक : जवाहर चौधरी
प्रकाशक : एपीएन पब्लिकेशन्स, दिल्ली
मूल्य : 130 रुपए