
अरुणिमा सिन्हा पहली दिव्यांग युवती हैं, जिन्होंने एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। एक नेशनल वॉलीबॉल और फुटबॉल खिलाड़ी का पर्वतारोही बनने के पीछे एक ऐसी कहानी है, जो किसी मोटिवेशनल गुरू ने नहीं सुनाई होगी। हाल ही में उन्हें भारत की सौ सबसे महत्वपूर्ण महिलाओं में चुना गया है और 22 जनवरी को राष्ट्रपति ने उन्हें भी लंच पर बुलाया है।
वॉलीबॉल में नौ बार राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी अरुणिमा साधारण मध्यवर्गीय परिवार की है। अरुणिमा का परिवार बिहार में रहता था. पिताजी फौज में थे, जिस कारण परिवार सुल्तानपुर आ गया. चार वर्ष की थीं, तभी पिता का स्वर्गवास हो गया। माँ को आम्बेडकर नगर में स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिली. किसी तरह गुज़ारा होता था. एलएलबी की पढ़ाई की। राष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबाल व फुटबाल में कई पुरस्कार जीते. नौकरी के लिए सीआईएसएफ में कांस्टेबल की परीक्षा देने के लिए वे 11 अप्रैल 2011 को पद्मावती एक्सप्रेस से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी। वे जनरल डिब्बे में थी।

रात को कुछ बदमाश डिब्बे में घुस आए और लूटपाट करने लगे। सारे यात्री भीगी बिल्ली बने रहे और बदमाशों की हर बात मानते रहे। अरुणिमा ने इसका विरोध किया और अपना पर्स और चेन देने से इनकार किया। नौबत हाथापाई पर आ गई और बदमाशों ने उन्हें टांगाटोली करके चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। समानांतर पटरियों पर दूसरी ट्रेन आ रही थी, जिससे टकराकर उनका एक पैर कट गया।

पूरी रात वे रेल पटरी के किनारे पड़ी रही। हिलने-डुलने की दशा में भी वे नहीं थी। उनका कटा हुआ पैर रेल पटरी के किनारे रहने वाले चूहे कुतर रहे थे और उनमें इतनी ताकत भी नहीं थी कि उन्हें भगा सके। अरुणिमा को इतना भी होश नहीं था कि उनका पैर किस ट्रेन से कटा है। बेहोशी की अवस्था में सुबह उस इलाके के किसी व्यक्ति ने उन्हें देखा और बरेली के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों ने कहा कि उनका कटा पैर अब जोड़ा नहीं जा सकता। अस्पताल में बेहोशी की दवा तक नहीं थी। बगैर एनेस्थीसिया के उनका ऑपरेशन किया गया।

खेल मंत्रालय ने उन्हें 25 हजार रुपए का मुआवजा दिया। बरेली के अस्पताल में इलाज चलने के दौरान ही अखबारों में उनकी कहानी छपी और केन्द्रीय खेल और युवा मामलों के राज्य मंत्री अजय माकन ने पहल की और उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया। दो लाख रुपए की राहत राशि भी मंजूर की गई। साथ ही सीआईएसएफ में उन्हें हेड कांस्टेबल की नौकरी का प्रस्ताव भी मिला और भारतीय रेलवे ने भी उन्हें नौकरी का प्रस्ताव दिया।

यह तो कहानी का एक ही हिस्सा है। लोगों ने उनके बारे में तरह-तरह की बातें कहीं। आरोप लगाए गए कि वे बिना टिकिट रेल में यात्रा कर रही थी। यह भी आरोप लगा कि उन्होंने नींद में रेल में से छलांग लगा दी थी। यहां तक कहा गया कि वे आत्महत्या करने के इरादे से रेल से कूदी थी। इनमें से कई आरोप तो पुलिस खुद लगा रही थी। अरुणिमा ने इसके खिलाफ लखनऊ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। वे केस जीती और भारतीय रेलवे से पांच लाख रुपए का मुआवजा भी प्राप्त किया।

एम्स में इलाज के दौरान यह बात तय हो गई कि अरुणिमा का पैर बचाया नहीं जा सकता था। इसी दौरान अरुणिमा ने तय किया कि वे न तो कभी बैसाखी का इस्तेमाल करेगी और न ही व्हीलचेयर पर बैठेगी। उन्होंने कृत्रिम (प्रोस्थेटिक) पैर लगवाना मंजूर किया। इस पैर के जरिये वे बिना बैसाखी के चल-फिर सकती थी।

इलाज के दौरान जब उन्हें पता चला कि उनके बारे में किस-किस तरह की चर्चाएं होती रही है, तो वे सन्न रह गई। उन्होंने फैसला किया कि वे इन सब आरोपों का जवाब बातों से नहीं, एक्शन से देंगी। इलाज के दौरान ही उन्होंने पढ़ा कि सबसे चुनौतीपूर्ण खेल पर्वतारोहण है और एवरेस्ट सबसे ऊंचा पर्वत शिखर। अस्पताल में ही उन्होंने तय कर लिया कि वे अपने प्रोस्थेटिक पैर की मदद से एवरेस्ट पर चढ़कर दिखाएंगी। जब यह बात उन्होंने अपने कुछ नजदीकी लोगों से शेयर की, तो उन्होंने कहा कि तुम लंगड़ी हो चुकी हो और अब तुम्हारे सामने चुनौती एवरेस्ट नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी है। इन सब बातों से अरुणिमा के हौसले पस्त नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपने संकल्प को और भी दोहराया। कैंसर की बीमारी से लड़ रहे युवराज सिंह की खबरें उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी। उन्होंने तय किया कि वे एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला बछेन्द्री पाल से मिलेंगी और मार्गदर्शन लेंगी। बछेन्द्री पाल जमशेदपुर के टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन में प्रशिक्षक है।

उन्होंने एक पत्रकार की मदद से बछेन्द्री पाल का फोन नंबर प्राप्त किया और उन्हें फोन किए। पांच-छह बार कॉल करने के बाद उनका संपर्क हो पाया। अरुणिमा ने बछेन्द्री पाल से मिलने की इच्छा जताई। वे क्यों मिलना चाहती है यह नहीं बताया। बछेन्द्री पाल जमशेदपुर में कार्यरत थी। एम्स से छूटते ही उन्होंने दिल्ली से जमशेदपुर का टिकट कटाया और रेल में बैठ गई। रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। पहली बार उन्हें दिव्यांगों के लिए आरक्षित कूपे में जगह मिली, जहां वे घुटनों में सिर छुपाकर पूरे समय रोती रही। जमशेदपुर पहुंचकर उन्होंने बछेन्द्री पाल को फोन किया और मिलने की इच्छा जताई। बछेन्द्र पाल का जवाब था कि कल ही तो बात हुई थी और आज तुम आ भी गई।

अरुणिमा को प्रोस्थेटिक पैर से चलने की आदत नहीं थी। घाव पूरी तरह भरे भी नहीं थे। जरा सा तेज कदम उठाते ही पैर की चमड़ी फट जाती और खून रिसने लगता। अरुणिमा ने हौसला नहीं खोया और बछेन्द्री पाल से मिली। ऐवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए बछेन्द्री पाल से ट्रेनिंग लेने की बात पर बछेन्द्री पाल की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा कि मुझे तुम पर गर्व है और मैं तुम्हें ट्रेनिंग भी दूंगी, लेकिन जो सपना तुम देख रही हो उसे पूरा करने के लिए दोनों सलामत पैर वाले लोग भी बहुत मुश्किल से कामयाब हो पाते हैं।

टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन ने अरुणिमा की मदद की और उत्तर काशी में लगने वाले फाउंडेशन के कैंप में उनका प्रशिक्षण शुरू हुआ। अरुणिमा को पहले 6150 मीटर ऊंची आईलैण्ड पीक नामक चोटी पर चढ़ने का लक्ष्य दिया गया, जो उनके प्रशिक्षण का हिस्सा था। यह चढ़ाई उन्होंने सफलतापूर्वक पूरी की। टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन उनके इस पर्वतारोहण अभियान का प्रायोजक था।

बछेन्द्री पाल के ही निर्देशन में एवरेस्ट की चढ़ाई चढ़ने वाली सूसेन महतो के साथ अरुणिमा ने एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की। अरुणिमा का एवरेस्ट अभियान 2 अप्रैल 2013 से 21 मई 2013 तक चला। वे एवरेस्ट फतह करने वाली पहली दिव्यांग महिला बनी। उनके भाई ओमप्रकाश और मां हमेशा उनके साथ सहयोग करते रहे। एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचना अरुणिमा के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और सम्मान मिलने लगे। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें राज्य सरकार की तरफ से तो 20 लाख रुपए की सम्मान निधि दी ही। समाजवादी पार्टी की तरफ से भी इतिहास बनाने वाली इस युवती को पांच लाख रुपए का इनाम दिया।

अरुणिमा को लगा कि उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया है। अब उन्हें दूसरों की मदद करनी चाहिए। इसी इरादे से उन्होंने पंडित चन्द्रशेखर आजाद विकलांग खेल एकेडमी की स्थापना की। इसका उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को खेल के लिए प्रेरित करना है और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाना। इस एकेडमी में प्रतिभावान दिव्यांग खिलाड़ियों को सभी सुविधाएं मुफ्त देने की व्यवस्था है।

28 वर्षीय अरुणिमा को गत वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उनकी लिखी किताब 'बोर्न अगेन ऑन द माउंटेन' का विमोचन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिसंबर 2014 को किया था।
अरुणिमा सिन्हा धार्मिक प्रवृत्ति की युवती है। बुरी से बुरी विपदा के वक्त भी उन्होंने ईश्वर में आस्था नहीं डिगने दी।
फरहान अख़्तर उनसे बहुत प्रभावित हैं और उन पर बायोपिक बनाना चाहते हैं, लेकिन अरुणिमा की माँग है कि उन्हें फिल्म की कुल आय का पंद्रह प्रतिशत रॉयल्टी डी जाए, ताकि वे विकलांगों के लिए एक अकेदमी खोल सकें. मामला अभी अटका हुआ है.
09 jan. 2016
7.47 AM
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