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वेलेंटाइन्स-डे के मौके पर लड़के-लड़कियां थिएटर में जा सकते हैं, पर फिल्म देखने जाएंगे, तो ‘फितूर’ अझेलनीय लगेगी। भले ही उसमें आदित्य रॉय कपूर, कैटरीना कैफ, लारा दत्ता, अदिति राव हैदरी, सुचित्रा पिल्लई, गोविन्द नामदेव, तब्बू और अतिथि भूमिका में अजय देवगन जैसे कलाकार हो। चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास 'ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स' पर आधारित होने का प्रचार, कैटरीना कैफ के हेयर स्टाइल पर 55 लाख रुपए खर्च करने और कश्मीर, हुमायूँ का मकबरा और पौलेंड के शानदार लोकेशन्स भी कुछ मदद नहीं कर पाए। चार्ल्स डिकेंस ने यह उपन्यास 1860-61 मेंं लिखा था। उस उपन्यास पर आधारित फिल्म में ‘दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’ जैसे डायलॉग अटपटे लगते है और अटपटा लगता है, डेविड कोलमैन हेडली के भूतपूर्व मित्र राहुल भट्ट का आभार मानना। कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने जाए तो अपनी रिस्क पर जाए। हमारी कोई जवाबदारी नहीं है।

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आदित्य रॉय कपूर ने इसमें आशिकी-2 जैसी ही एक्टिंग की है। आशिकी-2 में आदित्य रॉय कपूर ने गायक की भूमिका निभाई थी, इसमें वे पेंटर बने है। कैटरीना कैफ की मोहब्बत में कुर्बान एक चित्रकार। कैटरीना कैफ को कश्मीर की रियासत की ‘भूतपूर्व राजकुमारी’ दिखाना ठीक लगता है, क्योंकि इनके पिता कश्मीर के ही थे। इस फिल्म में कश्मीर और डल लेक जितने सुंदर दिखाए गए है, शायद ही किसी और फिल्म में हो, लेकिन इसी कारण तो फिल्म नहीं झेल सकते।

फिल्म के कुछ डायलॉग वास्तव में दिलचस्प है, जैसे- ‘कयामत भी क्या चीज है, बिना दस्तक दिए, बिना आगाज के ही आ जाती है।’ ‘कैसा कमजर्फ जमाना आ गया है, हरेक को अपने हिस्से की जन्नत चाहिए’। ‘तुम खास हो और इश्क में लुटने के लिए नहीं बनी हो’। ‘अगर किस्मत में खाक लिखा है, तो वह भी कबूल है’। 'खुद से आजादी या तो मौत दे सकती है या इश्क'।

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निर्देशक के रूप में एकता कपूर के कजिन अभिषेक कपूर ने अच्छा निर्देशन किया है। फ्रेम दर फ्रेम उनकी उपस्थिति नजर आती है। इंटेंस लवर के रूप में आदित्य रॉय कपूर ने अच्छी एक्टिंग की है। फिल्म के कुछ दृश्य यादगार बन पड़े है। जैसे तब्बू की अंतिम यात्रा शिकारे पर ले जाने का दृश्य। पौलेंड की मशहूर आर्ट गैलरियों को भी दिखाया गया है। कुछ अटपटे दृश्य भी है, जैसे बर्फबारी के दृश्यों में हीरो-हीरोइन का बिना किसी गर्म कपड़े के जाना।

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फिल्म की कहानी का चार्ल्स डिक्कन्स के उपन्यास से कोई खास लेना-देना नहीं है। हीरो कश्मीर का आम आदमी है और हीरोइन शहजादी। बचपन में एक तरफा मोहब्बत के बाद हीरो अकेला रह जाता है और हीरोइन लंदन चली जाती है। हीरोइन की मां कहती है कि कुछ बनकर तो दिखाओ। हीरो जुट जाता है कुछ बनने में। इसके बाद फिर फ्लैशबेक पर फ्लैशबेक आते जाते है। हरेक की अपनी कहानी है। बरसों बाद हीरो-हीरोइन से मिलता है, तब उसकी सगाई पाकिस्तान के एक मंत्री के परिवार में होने वाली होती है। हीरो तब भी एक तरफा प्यार में डूबा रहता है। हीरोइन की सगाई हो जाती है, लेकिन अंतत: वह सगाई तोड़कर हीरो की झोली में आ टपकती है। खेल खतम, पैसा हजम।

 

12 Feb 2016

2.35 PM

 

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