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तमाशा एक ऐसी लव-स्टोरी है, जो शहरी पढ़े-लिखे वर्ग के एक हिस्से को बेहद पसंद आएगी। जब फिल्म खत्म हुई, तब थिएटर में युवा वर्ग की फुसफुसाहट थी कि मजा नहीं आया। ऐसा लगता है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत ज्यादा सफल नहीं होगी, लेकिन यह बात तय है कि इम्तियाज हुसैन ने एक शानदार लव-स्टोरी बनाई है। फिल्म का पहला आधा हिस्सा बेहद मनोरंजक है और बाद का बेहद संवेदनशील।

जेम्स बांड की फिल्मों का अपना ही मजा है। वहां कुछ सोचने समझने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर फिल्म हिन्दी में डब की गई नहीं हो, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता। जेम्स बांड 007 की नई फिल्म स्पेक्टर भी इसी कड़ी की चौबीसवीं फिल्म है। मैक्सिको, ब्रिटेन, आस्ट्रिया, इटली आदि देशों में फिल्माई गई इस फिल्म में वह सब मसाले है, जो जेम्स बांड की फिल्मों में होते हैं। शानदार मारकाट, दुनियाभर की लोकेशन्स, कारों, हेलीकाप्टरों, हवाईजहाजों के करतब, जमीन, आकाश और पानी में होने वाली लड़ाइयां और हीरो-हीरोइन के चुम्बन दृश्य। स्पेक्टर में भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने कैंची चला दी और चुम्बन के दृश्यों को छोटा करवा दिया। इसके विरोध में फिल्म के कारोबारी लामबंद हो गए और फिल्म प्रमाणन बोर्ड के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। यह फिल्म देखने के बाद ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि चुम्बन के दृश्य छोटे होने से फिल्म की कहानी प्रभावित होती है। चुम्मा-चाटी तीन मिनिट न होकर 10-20 सेकंड हो तो दर्शकों के एक वर्ग को निराशा होना स्वाभाविक है।

राजश्री प्रोडक्शंस ने पुरानी कढ़ी डबल छौंक के साथ नए बाउल में परोस दी है -- 'प्रेम रतन धन पायो'. इस बार सूरज बड़जात्या ने कढ़ी बघारते समय ध्यान रखा है और बघार में आदर्श कम डाले हैं और मसालों में फाइट, रेडीमेड इमोशंस, कॉमेडी, 'पूर्वघोषित मिस्ट्री' आदि भी डाले हैं. कहानी वही घिसी पिटी है, पर उसका फिल्मांकन मनोरंजक है। यह सूरज की पहली फिल्म है जिसे फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने तीन काट मारे हैं। फांसी के सीन, रखैल शब्द और राम लीला का फूहड़ फिल्मांकन हटाना पड़ा था। फिर भी फिल्म में इसका असर नजर नहीं आया।
फिल्म समीक्षा : तितली

फिल्म तितली को बॉलीवुड के पेड फिल्म समीक्षक चाहे जितने स्टार दें, यह महाबकवास फिल्म है। भूलकर भी यह फिल्म देखने जाने की कोशिश न करें। यशराज बैनर की हर फिल्म अच्छी हो यह जरूरी नहीं। हां, यह फिल्म यशराज की सबसे घटिया फिल्म है। इस फिल्म को अगर स्टार देना हो, तो मैं पांच में से 'मायनस पांच' ही दे सकता हूं।

चर्चा थी कि नसीरुद्दीन शाह ने एडल्ट फिल्म 'चार्ली के चक्कर में' फिल्म फ़ोकट में की; इस कारण जिज्ञासा थी कि फिल्म कुछ ठीक होेगी। देखने पर लगा कि नसीरुद्दीन शाह ने ठीक ही किया। शराब, सिगरेट, ड्रग, अपराध और क़ानून की गिरफ़्त में फंसे बॉलीवुड के स्ट्रगलर्स के साथ क्या-क्या घट सकता है, इसी की झलक दिखाने की कोशिश फ़िल्म में है। अंत भी रहस्यमय है। फिल्म कई जगह इरिटेट भी करती है।

'शानदार' उतनी 'फैब्यूलस' नहीं है ! इसे 'भारत की पहली डेस्टिनेशन वेडिंग पिक्चर' कहा जा सकता है. ऊँची दुकान, फीके पकवान जैसी यह फिल्म शाहिद कपूर को 'सौ करोड़ क्लब' में शामिल कराएगी, इसमें शक है। 'फैक्टरी मेड इमोशंस' वाली यह फिल्म रोमांस और कॉमेडी का मिक्स्चर है. करन जौहर की दूसरी फिल्मों जैसी इस फ़िल्म में मसाले ही मसाले हैं! जैसे आप रेस्टोरेंट में जाकर दाल फ्राय आर्डर करो और उसमें मसाले ही मसाले हो, दाल गायब हो, वैसा ही शानदार देखते वक्त लगता है.-- ठूंसे हुए गाने, झमाझम सेट और भव्यतम लोकेशन ! इस फिल्म के डायरेक्टर विकास बहल हैं ! 'क्वीन' के उनके निर्देशन से आशा जागी थी। दशहरे पर रिलीज़ करके करके इस फिल्म बेहतर कारोबार की संभावनाओं को बढ़ा दिया गया है --'चार दिन का वीकेंड' शायद नैया पार करा देगा।