
30 जुलाई को याकूब मेमन को फांसी की सजा मिलती है या नहीं, यह अभी तय नहीं है। याकूब मेमन और उनके वकील अभी भी कोशिश कर रहे है कि याकूब को फांसी न हो। याकूब मेमन की क्यूरेटिव याचिका भी खारिज कर दी गई है। क्यूरेटिव याचिका सुप्रीम कोर्ट की सजा के बाद और रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद दाखिल की जाती है। क्यूरेटिव पिटीशन खारिज होने के बाद अब उसके वकील कोई नया रास्ता खोज रहे है। क्यूरेटिव पिटीशन की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में नहीं, बल्कि चेम्बर में होती है।

लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों को मिलने वाले वेतन और भत्तों की समीक्षा के लिए जो समिति बनाई गई थी उसकी लगभग आधी सिफारिशें मानने से सरकार ने मना कर दिया है। सांसदों के लिए वेतन भत्तों को लेकर बनी एक्शन टेकन रिपोर्ट पर चर्चा के लिए संयुक्त समिति की अगली बैठक 13 जुलाई को होगी। सूचना है कि भारत सरकार ने समिति की 65 सिफारिशों में से 18 को पूरी तरह खारिज कर दिया है। तीन सिफारिशों के बारे में कहा है कि वक्त आने पर फैसला लिया जाएगा और 15 सिफारिशों पर असहमति जताई गई है।

बजट है या अंधों का हाथी? कैसा है ये बजट? मध्यवर्गीय की नज़र में -- जेब काटने और महंगाई बढाने वाला !उद्योगपतियों की नज़र में -- निवेश और रोजगार बढ़ानेवाला। बीपीएल के लिए -- आशाजनक ! सत्तासीनों की निगाह में --ऐतिहासिक और विपक्ष की नजर में -- होपलेस ! जिस तरह रेल बजट में आशा के विपरीत कोई नयी रेल चलाने का ऐलान नहीं था, आम बजट में भी आशा के अनुरूप कोई नयी छूट टैक्स में नहीं मिली।

एक जुलाई की शाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब डिजिटल इंडिया सप्ताह की शुरुआत कर रहे थे और इस बात का ऐलान भी कर रहे थे कि भारत में अगले पांच साल में 18 लाख नौकरियां बढ़ेंगी। जीडीपी 128 लाख करोड़ से बढ़कर १९२ लाख करोड़ होने की संभावना है। उसी कार्यक्रम में मुकेश अंबानी ढाई लाख करोड़ के निवेश की बात कर रहे थे। टाटा समूह के सायरस मिश्री 60 हजार नई नौकरियों का वादा कर रहे थे और यह कह रहे थे कि भारत चायनीज मोबाइल से भी सस्ते मोबाइल बनाकर एक लाख नई नौकरियां जनरेट करेगा, उसी वक्त मध्यप्रदेश के खण्डवा के पास एक बस दुर्घटना होती है और उसमें 25 लोगों की मौत हो जाती है।

ऐसा लगता है कि बांग्लादेश भी अफ़ग़ानिस्तान और ईराक के कट्टर पंथियों की राह पर चल पड़ा है. 26 फ़रवरी को ब्लॉगर, लेखक, अनीश्वरवादी बुद्धिजीवी अविजित रॉय की हत्या यही बता रही है. लगता है कि बांग्लादेश में अब धर्मनिरपेक्ष, विज्ञानसम्मत, स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति पर ख़तरा और बढ़ गया है.

उस दिन भी शुक्रवार था। तारीख 12, महीना मार्च का और साल 1993. दोपहर करीब सवा बजे हमारे वीटी ऑफिस के सामने से एक के बाद एक, लगातार कई दमकलें सायरन बजाते हुए फ़्लोरा फाउंटेन की तरफ़ दौड़ी जा रही थीं। मैं अपने सहकर्मी पत्रकार सुमंत मिश्र के साथ भयपूर्ण उत्सुकता के साथ उस दिशा में पैदल ही लगभग दौड़ते हुए पहुंचा तो पाया कि स्टॉक एक्सचेंज में बहुत प्रभावशाली बम विस्फोट हुआ है। वहां खून ही खून और जख्मी लोगों और शवों को देख रिपोर्ट करने अपने अखबार नवभारत टाइम्स के दफ़्तर आए और अपने प्रधान सम्पादक श्री विश्वनाथ सचदेव को पूरा किस्सा बताने उनके केबिन में पहुंचे। हमें घबराया सा देखकर उन्होंने पहले तो बैठने का कहा और फिर पानी पिलवाने के बाद बताया कि और भी करीब दर्ज़न स्थानों पर बम धमाके हुए हैं और यह कोई बड़ी आतंकी साजिश है।

धीरूभाई अंबानी को लेकर एक किस्सा याद आता है, जो उन्होंने अपने सहयोगी से कहा था- हम कहां उद्योग धंधा लगाएं, यह बात पहले तय करते है और फिर उसके बाद जमीन कबाड़ते है। जमीन भी हमारे लिए एक तरह का रॉ-मटेरियल ही है। आज अधिकांश कार्पोरेट यही कर रहे है, जो यह नहीं कर पा रहे है वे ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे है। इसके अलावा एक बहुत बड़ा खेल कार्पोरेट जगत कर रहा है और वह है ‘लैंड बैंक’ बनाने का। लगभग सभी बड़े घरानों की अपनी लैंड बैंक है। वे उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे है और इंतजार कर रहे है कि कब वह जमीन और महंगी हो और वे उसका उपयोग ज्यादा व्यावसायिक तरीके से करें।

भूमि अधिग्रहण को लेकर कानून बनाने पर लम्बी कवायद जारी है। इस मामले में राजनीति भी खुलकर हो रही है। राजनैतिक दल अपना हित साधने में लगे है। विपक्ष को लगता है कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसके जरिए वह सरकार की लोकप्रियता में सेंध लगा सकती है। सरकार को लगता है कि भूमि अधिग्रहण के जरिए वह अपने विकास के कार्यक्रमों को खुलकर आगे बढ़ा सकेगी।

एक खत, अमर्त्य सेन के नाम
आदरणीय अमर्त्य सेन साहब. आप भारत रत्न, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हैं, मैं एक नाचीज़ आपको यह खत लिख रहा हूँ. गुस्ताख़ी की माफी पहले ही माँग रहा हूँ. आपकी नाराज़गी हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से रही है और आप उसे समय समय पर व्यक्त भी करते रहे हैं. यह भी सच है कि आप विकास के गुजरात मॉडल की तारीफ भी करते रहे हैं. लेकिन अभी आप नालंदा विश्वविद्यालय के चांसलर (कुलाधिपति) पद से हटने को लेकर जो क्षुद्र राजनीति कर रहे हैं, वह मेरी समझ से परे है.

मदर टेरेसा की अप्रत्यक्ष आलोचना करने वालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की बात विवादों में घिरी रही है। संसद में भी इस पर चर्चा की और अनेक राजनैतिक दलों ने मोहन भागवत की आलोचना की। शिवसेना ने जरूर भागवत के बयान का एक हद तक समर्थन किया, लेकिन मोहन भागवत पहले व्यक्ति नहीं है, जिन्होंने मदर टेरेसा के बारे में खुलकर अपने विचार रखें। मोहन भागवत ने कहीं भी मदर टेरेसा की सेवा की आलोचना नहीं की। उन्होंने यहीं कहा कि मदर टेरेसा की सेवा के पीछे धर्म परिवर्तन का उद्देश्य छुपा था। अगर हम अपने लोगों की सेवा करें तो किसी और व्यक्ति को यहां आकर सेवा करने की जरुरत ही नहीं पड़े।
जब भी आम चुनाव आते है भारत में कारोबार बढ़ जाता है। मरणासन न्यूूज चैनलों को नया जीवन मिल जाता है। छोटे-मोटे अखबार भी खासी कमाई करने लगते है। पार्टी कार्यकर्ता से लेकर छोटे-मोटे दुकानदार तक रोजगार में लग जाते है। इस कारोबार में घोषित और अघोषित दोनों तरह के लेन-देन होते है। चुनावों को पारदर्शी बनाने के लिए बहुत सारे प्रयास किए गए, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। भारत के कंपनी कानूनों के मुताबिक कोई भी कंपनी अपने तीन वर्ष के मुनाफे के औसत का साढ़े सात प्रतिशत राजनैतिक पार्टियों को दान दे सकती है।