
इंदौर में युवाओं का एक समूह है, जो प्रकृति के बीच जीना सिखाता है। पर्यटन केन्द्रों के नाम पर सुविधाएं इकट्ठा कर ली, लेकिन लोगों को प्रकृति के बीच जीना नहीं आया। पर्यटन विकास का अर्थ हमारे यहां यह है कि आवागमन की सुविधाएं हो, खाने-पीने की व्यवस्था उपलब्ध हो और मौज-मस्ती का तमाम सामान एक जगह मुहैया हो जाए। इस सबका बुरा परिणाम यह है कि लोग पर्यटन केन्द्रों पर जाते है गंदगी करके है और लौट आते है। पर्यटन केन्द्रों पर स्वच्छता का जो स्तर होना चाहिए वह नहीं होता। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि पर्यटन के नाम पर सरकार भी केवल कारोबार को बढ़ावा दे रही है। इंदौर के युवाओं का यह समूह इस सोच के खिलाफ एक अभियान है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद मीडिया के हर सेक्टर में उसकी समीक्षाएं की जा रही है। इन समीक्षात्मक टिप्पणियों के शीर्षक मजेदार है। जैसे- आप की जीत के 10 कारण, आप की जीत के 7 कारण, इन कारणों से जीती आम जनता पार्टी, वे पांच कारण जिन्होंने भाजपा को डुबाया, आम आदमी पार्टी की जीत का कारण सोशल मीडिया, किरण बेदी को लाना भाजपा को महंगा पड़ा आदि-आदि।

छोटे अखबारों और केबल की दुनिया में यह बात आम है, लेकिन सेटेलाइट चैनलों की दुनिया में इसे अजूबा ही कहा जाएगा कि मालिक, पत्रकार की तरह बनना चाहे और पत्रकार, मालिक की तरह। रजत शर्मा का करियर पत्रकार के रूप में शुरू हुआ और आज वे इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा है। दूसरी तरफ सुभाष चंद्रा है जिन्होंने बहुुत छोटे से स्तर पर कारोबार शुरू किया और पैकेजिंग की दुनिया से टीवी की दुनिया में आए। रजत शर्मा कभी इनके चैनल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया करते थे। इतने बरसों में यह अंतर आया है कि रजत शर्मा सुभाष चंद्रा की तरह मालिक बन गए और सुभाष चंद्रा रजत शर्मा की तरह टीवी प्रेजेंटर बनने की कोशिश कर रहे है। चैनलों का मालिक होने का फायदा सुभाष चंद्रा को जरूर है, लेकिन इससे वे रजत शर्मा की बराबरी नहीं कर सकते।
(सभी आदरणीय लोगों से अग्रिम हार्दिक क्षमा याचना के साथ)
मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने नसीब की जो बात कही है, सच ही है.

आ. ताई सुमित्रा महाजन जी ने गत भाई दूज पर मुझे भोजन कराया था, आज वे लोकसभा की स्पीकर हैं! कैलाश विजयवर्गीय जी ने घर पर कई बार डिनर कराया, वे लगातार मप्र के केबिनेट मंत्री हैं और मलाईदार पदों पर हैं. आइएएस एसके मिश्र ने भोपाल के होटल पलाश में लंच खिलाया था, लोकायुक्त की तमाम जांच के बावजूद आज वे मध्यप्रदेश के सीएम के खासमखास हैं. आ. विधायक मालिनी गौड़ ने एक बार भोपाल में चाय-नाश्ता कराया था, टिकट मिला और 4 जनवरी को इंदौर की महापौर बनने ही वाली हैं. जनक पल्टा दीदी ने सोनवाय के फार्म में बुलाकर मिठाई खिलवाई, आज 'पद्मश्री' हैं. दादा शेखर सेन का आइआइएम में प्रोग्राम था, मुझे न्योता दिया, वे भी आज 'पद्मश्री' हैं.

‘शाहिद मिर्जा मुहम्मद बेग चुगताई’ (यही तो था उसका पूरा नाम) को खुदा के घर वाया आपरेशन थियेटर पाना मंजूर नहीं था, शायद इसीलिए उसने शार्ट कट चुना। परसों, २७ मई को जन्मदिन पर बधाई का फोन किया तो उसने कहा ‘‘यार तबियत तो ठीक नहीं है, पर ऐसी भी नहीं कि ट्रांसप्लांट कराने की जरूरत पड़े। (भैंरोसिंह) शेखावत जी से बात हुई तो उन्होंने कहा था कि ऐम्स में करा देता हूं, अनुपम (मिश्र) का फोन था कि आ जाओ पर क्या करना..५ जून को नईदुनिया का साठ साल वाला जश्न है, बुलाया है...हो सका तो आऊंगा।’’
मालवीय जी बीएचयू के संस्थापक न होते तो भी क्या उन्हें भारत-रत्न मिलता? कल 25 दिसंबर को मालवीय जी के जन्मदिन के मौके पर बीएचयू में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालवीय जी को भारत रत्न की घोषणा करनेवाले थे, लेकिन एक दिन पहले ही राष्ट्रपति जी के एक ट्विट ने मालवीय जी और अटल बिहारी वाजपेयी को भारत-रत्न की सूचना देकर इस मामले में नया मोड़ दे दिया.
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समृद्धि के लिए शांति जरूरी है और शांति के लिए युद्ध। वूâटनीतिक कौशल की अपनी महत्ता है, लेकिन युद्ध की जगह युद्ध ही जरूरी होता है। हर युद्ध जीत के लिए, केवल जीत के लिए लड़ा जाता है। आजादी के बाद हमने पाकिस्तानी फौजों से तीन युद्ध (1947-48, 1965 और 1971) लड़े व जीते और चीन से एक युद्ध (1962) लड़ा और मात खाई। चीन से हार का खामियाजा तो हमने हजारों जवान और जमीन खोकर भुगता ही, वूâटनीतिक कौशल के अभाव में जीते हुए युद्ध का भी अपेक्षित लाभ नहीं उठा सके और न ही दुश्मन को अपेक्षित क्षति पहुंचा सके।

यह जानना दिलचस्प है कि देवआनंद कभी पोस्ट ऑफिस में काम करते थे, सुनील दत्त ‘बेस्ट’ में हिसाब किताब रखते थे, सुशील कुमार शिंदे कोर्ट में अर्दली और पुलिस सब इंसपेक्टर थे, अनिल धारकर इंजीनियर थे, रजनीकांत औैर हसरत जयपुरी बस वंâडक्टर थे, गुलशन कुमार ज्यूस बेचा करते थे, प्रेम चोपड़ा टाइम्स ऑफ इंडिया के विज्ञापन विभाग में काम करते थे, जॉनी लिवर हिन्दुस्तान लीवर कम्पनी में मजदूर थे, दादा कोंडके शादी-ब्याह में बाजा बजाया करते थे...एक लम्बी पेâहरिस्त है इसकी। यहां प्रकाश हिन्सुतानी प्रस्तुत कर रहे हैं कुछ ऐसी ही विलक्षण प्रतिभाओं के बारे में जो में मिथक बन गये हैं।
वीकेंड पोस्ट (23 अगस्त 2014)
15 अगस्त1975 को रिलीज हुई शोले ढाई साल में बनी। 3 अक्टूबर1973 से इस फिल्म की शूटिंग शुरु हुई थी और यह अपने समय की सबसे महंगी फिल्मों में शामिल थी। उस समय इस फिल्म की लागत करीब ३ करोड़ रुपए आई थी और इसने रिकॉर्ड कारोबार किया। पांच साल तक एक ही थिएटर में लगातार प्रदर्शन का रिकॉर्ड भी इस फिल्म के नाम है। इस फिल्म के कई कलाकार अब इस दुनिया में नहीं है। कई कलाकारों के बच्चे फिल्मी दुनिया पर राज कर रहे है। कई कलाकारों ने इस फिल्म से पहचान बनाई और कई कलाकार केवल इस फिल्म के कारण ही जाने-पहचाने जा रहे है।
कुन्दन सोनी नाम बताया था उसने। मुझे लगा कि वह स्वर्णकार का पुत्र होगा, क्योंकि उपनाम सोनी था और नाम था कुन्दन यानी सोना।
‘‘क्या तुम्हारी सोने-चांदी बेचने की दुकान है?’’ पूछ लिया था यों ही।
‘‘नहीं’ सर, हमारे दादा-परदादा इस बिजनेस में थे। पर पिताजी सर्विस करते हैं। हां, हमारे अंकल लोग अभी भी इसी बिजनेस में है।’’
महसूस किया कि ‘दूकान’ शब्द का इस्तेमाल उसे अच्छा नहीं लगा। इसके बजाय उसने ‘बिजनेस’ शब्द का उपयोग दो बार किया था। मुंह बिचकाने की अदा से यह भी लगा कि वह ‘बिजनेस’ में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखता।
‘‘क्या कर रहे हो आजकल?’’
‘‘आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा हूं।’’

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