
भोपाल में सम्पन्न 10वां विश्व हिन्दी सम्मेलन कितना कामयाब रहा, इसके बारे में अलग-अलग दावे है। सफलता का दावा करने वालोंं ने कहा है कि इस सम्मेलन में हिन्दी के विकास को लेकर समग्र परिपेक्ष्य में हिन्दी पर चर्चा हुई। यह पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन था, जिसमें हिन्दी के विकास, विस्तार, प्रभाव, विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी के उपयोग जैसे विषयों के साथ ही हिन्दी की सहोदरी भाषाओं के विकास पर भी चर्चा हुई। इस आयोजन को विफल बताने वाले कहते हैं कि यह एक राजनैतिक सम्मेलन की तरह सम्पन्न हुआ। उनका यह भी कहना है कि यह सम्मेलन एक इवेंट था। जिसमें बड़े-बड़े दावे और आत्मप्रचार सबकुछ था। अमिताभ बच्चन इस समारोह में नहीं आए, यह भी बताता है कि कार्यक्रम को लेकर सेलेब्रिटीज में कोई बहुत उत्साह नहीं था।

वे टाइम्स समूह के 'नभाटा' में पत्रकार थे. फ़िल्म पत्रकारिता करते, डॉक्युमेंट्री बनाते थे. ढाई दशक पहले यूएसए जा बसे. मूलत: बिहार के अशोक ओझा वहां हिन्दी के स्टार टॉक कार्यक्रम से जुड़कर हिन्दी के शिक्षण-प्रशिक्षण में जुट गए. अमेरिका में उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार का काम शुरू किया. उनकी कोशिश थी कि भारतीय मूल के सभी लोग तो हिन्दी सीखें ही, अमेरिका के लोग भी हिन्दी सीखें क्योंकि अमेरिकी सरकार ने बिजनेस के लिए हिन्दी को 'क्रिटिकल लेंग्वेज' माना है.

31 जुलाई को मुम्बई यात्रा पर आए एक विदेशी ने टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार देखते ही पूछा कि क्या याकूब मेमन ही भारत के राष्ट्रपति थे, जिनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है? जब उसे बताया गया कि नहीं, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे कलाम थे और उनको भी कल ही दफनाया गया था।

वर्तिका नंदा ने टीवी में क्राइम रिपोर्टिंग को उस वक़्त चुना, जब मीडिया में आनेवाली 99 प्रतिशत युवतियां एंकर बनना चाहती थीं या ग्लैमरस लाइफ़ स्टाइल प्रोग्राम की रिपोर्टर ! वे मीडिया की छात्रा रहीं, दिल्ली में टीवी चैनल में क्राइम रिपोर्टर , प्रोड्यूसर और न जाने क्या-क्या रहीं; वे पत्रकार हैं पर वैसी पत्रकारिता नहीं करतीं, जैसी बरखा दत्त करती हैं! वे सोशल वर्कर हैं पर कोई एनजीओ नहीं चलातीं, वे जेण्डर कम्युनिकेटर हैं और महिलाओं के सशक्तिकरण से जुडी हैं, वे कवयित्री हैं और तीन साल से जेल में बंद महिलाओं की आवाज़ बन गई हैं. आजकल दिल्ली के लेडी श्रीराम (LSR) कॉलेज में फैकल्टी और एचओडी हैं.

ऑल इण्डिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के पूर्व चीफ विजिलेंस ऑफिसर संजीव चतुर्वेदी और एनजीओ गूंज के प्रमुख अंशु गुप्ता को 2015 का रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड दिया जाने वाला है। एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले इस पुरस्कार को पाने वालों में लाओस की एक हैंडीक्राफ्ट सहकारी संस्था की संचालक कॉमली चंटवांग, म्यांमार के एक्टर-डायरेक्टर जॉव थू और फिलीपिंस की कलाकार लीगाये फर्नान्डो को भी यह पुरस्कार दिया जाने वाला है। फिलीपिंस के तीसरे राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे की याद में यह सम्मान दिया जाता है। संजीव चतुर्वेदी ने एम्स के सीबीओ रहते हुए भ्रष्टाचार के 200 से अधिक मामले उजागर किए। इनमें से 78 मामलों में सजा दी जा चुकी है। 87 मामलों में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और करीब 20 मामलों में सीबीआई की जांच शुरू हो गई है। संजीव चतुर्वेदी के कारण सरकार की कई बार किरकिरी भी हो चुकी है। संजीव चतुर्वेदी कहते है कि वे व्यवस्था में सुधार चाहते है और उसी के लिए कार्य कर रहे है।
कहीं जूते गांठते हुए, तो कहीं
चाय बेचते हुए साहित्य सृजन
साहित्य की सेवा के लिए बड़े पद पर होना जरूरी नहीं है, न ही उसके लिए बहुत पैसे होने वाला आवश्यक है। पाकिस्तान के शायर मुनव्वर शकील और भारत के दिल्ली में रहने वाले लक्ष्मण राव ने यह बात साबित कर दी है। मुनव्वर शकील की पांच किताबें साया हो चुकी हैं और छठीं का मसौदा मुकम्मल हैं। यह छठीं किताब गजलों की होगी और इसमें 112 गजलें शामिल हैं। पेशे से मुनव्वर शकील पाकिस्तान के फैसलाबाद के एक छोटे से कस्बे रोडाला में सड़क किनारे मोची की दुकान लगाते हैं और जूते सुधारते हैं। इससे उनका गुजारा नहीं हो पाता, तो सुबह-सुबह अखबार फरोशी भी कर लेते हैं। दिल्ली में रहने वाले लक्ष्मण राव 63 साल के हैं और फुटपाथ पर चाय की दुकान चलाते हैं। लक्ष्मण राव की 44 किताबें आ चुकी हैं। दोनों में समानता यह है कि उनकी दुकान पर जाकर आप किताब भी खरीद सकते हैं और साहित्य की चर्चा कर सकते हैं।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का कद आसमान जैसा था, लेकिन उनके पैर हमेशा जमीन पर रहते थे। इसीलिए वे इतने बड़े व्यक्ति माने जाते है। राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे हमेशा सामान्य लोगों की तरह ही बर्ताव करते रहे और राष्ट्रपति पद से निवृत्त होने के बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा के लिए समर्पित रहे। उन्होंने इतने उल्लेखनीय कार्य किए कि उनकी हर बात पत्थर पर लिखी लकीर की तरह नजर आती है। रामेश्वरम के एक छोटे से गांव से सफर शुरू करने वाले डॉ. कलाम ने अहंकार को कभी अपने नजदीक नहीं आने दिया। इनोवेटिव तरीके से वे सेवा के नए-नए आयाम खोजते रहे। विद्यार्थियों को प्रेरणा देते रहे और भारत में बदलाव के प्रमुख आर्किटेक्ट बने। यह बात उन पर बिलकुल सही बैठती है कि बड़े आदमी बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते, बड़े आदमी छोटी-छोटी बातें भी करते है और छोटी बातों का ध्यान रखते है। उनके दर्जनों किस्से है, जो बताते है कि वे किस मिट्टी के बने थे और उनकी आत्मा किन गहराइयों तक पहुंच रखती थी।

भोपाल में 10 से 12 सितंबर तक विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। भोपाल इस आयोजन की मेजबानी के लिए तैयार है। भोपाल में कोई भी आयोजन करने का मतलब है- इवेंट करना। इवेंट मतलब तामझाम, दिखावा और अपनी गोटी फिट करना। आयोजन का उद्देश्य क्या है, आयोजन से कहां पहुंचा जा सकता है, आयोजन का लाभ लोगों तक कैसे पहुंचे, जैसी बातों से आयोजकों को मतलब नहीं। मतलब होगा भी क्यों, क्योंकि यह आयोजन ही सरकारी है। विदेशी मामलों का विभाग इसे आयोजित कर रहा है और मध्यप्रदेश सरकार और उसके विभाग इसमें सहयोगी हैं। कोई भी विश्व स्तर का आयोजन हो और उसमें प्रधानमंत्री आ जाएं, तो सभी को अपनी-अपनी गोटी बिठाने का शानदार मौका मिल जाता है। बजट की कोई कमी भी नहीं रहती, क्योंकि प्रधानमंत्री आ रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री तो यूं भी हिन्दी के समर्थक हैं। आयोजक विदेश मंत्रालय सुषमा स्वराज के भरोसे है, जो भोपाल के पड़ोसी विदिशा से लोकसभा की प्रतिनिधि हैं।
हमेशा अखबारों के शीर्षक ही इतिहास नहीं बताते, कभी-कभी विज्ञापन भी इतिहास बताते है। कभी-कभी तो 4-5 सेंटीमीटर में छपे विज्ञापन भी इतिहास की ऐसी घटनाओं पर रोशनी डाल देते है कि उस अतीत से खून खौल उठता है। न्यू फ्लोरिडा मेल, अमेरिका अखबार के 8 मार्च 1846 को छपे इस विज्ञापन पर भी नजर डालें। यह विज्ञापन कहता है कि 19 साल की एक सुंदर निग्रो गुलाम युवती, जो गर्भावस्था के प्रारंभिक दौर में है, को कोई चुरा ले गया है या भाग गई है। उसे पकड़कर लानेवाले को पचास डॉलर का नकद इनाम दिया जाएगा।

25 सांसदों के निलंबन को लेकर लोकसभा में चल रहे गतिरोध के बारे में सोशल मीडिया में जगह-जगह यह टिप्पणी आ रही है कि सदन का कामकाज न होने पर सांसदों का वेतन काट लेना चाहिए। ऐसी टिप्पणी अपरिपक्वता की निशानी है। हमारे माननीय सांसद देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंच हैं, कोई मनरेगा के मजदूर नहीं। संसद में होने वाले विवाद, परिवाद, विरोध प्रदर्शन आदि सभी गतिविधियां हमारे लोकतंत्र का एक हिस्सा है। संसद का बहिष्कार करना भी सदस्यों की एक गतिविधि है। संसद सदस्य लोकसभा में भले ही मौजूद न हो, संसद भवन परिसर में गांधी प्रतिमा के समक्ष मौजूद है और विरोध का कार्य कर रहे है। यह विरोध ही लोकतंत्र की शक्ति है। विरोध किस विषय पर हो रहा है यह चर्चा का विषय हो सकता है।

-प्रकाश हिन्दुस्तानी
जयपुर की श्रीमति सुभद्रा कोठारी ने उन लोगों के लिए किताब लिखी है, जो अंग्रेजी तो जाते है, लेकिन हिन्दी नहीं। ‘हिन्दी मेड ईजी’ शीर्षक से प्रकाशित उनकी किताब उन लोगों के लिए बेहद उपयोगी है, जो हिन्दी सिखना चाहते हैं और जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी है या वे अंग्रेजी में निपुण है। इस किताब का उद्देश्य बोली जाने वाली और लिखी जाने वाली साधारण हिन्दी से परिचय कराना है।